सादर वन्दे
आज कोई छुट्टी नहीं
फिर भी मैं यहां हूँ..
अगर मैं सोचूं कि मुझे
किसी की भी ज़रूरत नहीं..
तो ये मेरा 'अहम' है
और अगर मैं सोचूं कि
सबको मेरी ज़रूरत है..
तो ये मेरा 'वहम' है
सच तो ये है
हम सब एक दूसरे के पूरक हैं
आइए रचनाओँ देखें....
मोल-भाव पर उठती-गिरती,
ये दुनिया बाज़ार सरीखी
साथ किसी दिन चल कर मेरे,
चैन मुझे ले देना,मालिक।
बिना नेह के ‘शरद’ व्यर्थ है,
दुनिया भर का सोना-चांदी
अच्छा लगता अपनेपन का
सूखा चना-चबेना, मालिक।

उर समेटे यातनाएं
होंठ सौम्या रेख बिखरी
ताप सहकर धूप गहरी
स्वर्ण जैसे और निखरी
यूँ हथेली रोक लेती
चूड़ियों का मौन क्रंदन।।

अनुग्रह तेरा कुछ ऐसा,मुमकिन नहीं कि ठुकरा दूँ,
जाम-ऐ-शराब-ऐ-मोहब्बत,मैं कब इंकार करता हूँ।
कहे 'परचेत',ऐ साकी,है कहने को न कुछ बाकी,
कुछ तो बात तुझमे,मैं तेरी मधु से प्यार करता हूँ।

हम तो देते तुम्हें एक ही नाम ...
बिन पेंदी का लोटा
जो किसी का ना होता
बस...
ढलमलाता
एक कोने से दूसरे कोने तक
जब तक पूर्ति ना हो जाए स्वार्थ।
किंतु क्या करें बताइए
आपकी विद्वता का ?
जिसके भार तले
साधारण जन मन
दबते चले जाते हैं ।
धराशायी हो जाता है
आत्मविश्वास इनका,
तिनका-तिनका जोङा
जो साहस जुटा कर ।
......
बस छुट्टी खतम
सादर
......
बस छुट्टी खतम
सादर

