सादर वन्दे
रविवार को
लिखना हो रहा है
कल छपेगी
अच्छा दिन है रविवार
सारे के सारे
बचे-खुचे काम
सलटा लिए जाते हैं
और सलटा भी
लेना भी चाहिए
आसानी से मिलने वाला लाभ है
..
आइए चलें
साथ ...प्रतिभा कटियार
रविवार को
लिखना हो रहा है
कल छपेगी
अच्छा दिन है रविवार
सारे के सारे
बचे-खुचे काम
सलटा लिए जाते हैं
और सलटा भी
लेना भी चाहिए
आसानी से मिलने वाला लाभ है
..
आइए चलें
साथ ...प्रतिभा कटियार

आसान नहीं होगा, माउंट एवरेस्ट से माउंट सिकदर करना ...गगन शर्मा
आजकल माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट राधानाथ करने की बात की जा रही है ! अच्छी बात है। पर ऐसा होना क्या आसान काम है ! यह कोई देश की सड़क, प्रांत या रेलवे स्टेशन का नाम तो है नहीं कि जिसे हम अपनी मर्जी से जब चाहें, जो चाहें रख लें ! ऐसा करने के पहले कई-कई देशों, यूनेस्को तथा ब्रिटेन की भी रजामंदी व अनुमति लेनी पड़ेगी और ये प्रयास भी अपने आप में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जितना ही मुश्किल होगा ....................!
हम हो रहे ग़ाफ़िल ... सुबोध सिन्हा
हम हो रहे ग़ाफ़िल ... सुबोध सिन्हा
अब तथाकथित खरमास खत्म हो चुका है।
पुरखों के कथनानुसार ही सही,
आज भी बुद्धिजीवी लोग कहते हैं कि
खरमास में शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
अब पुरखों की बात तो माननी ही होगी,
नहीं तो पाप लगेगा। ख़ैर ! ...
बुद्धिजीवियों के हुजूम के रहते
पाप-पुण्य तय करने वाले हम होते कौन हैं भला ? .. शायद ...
विपन्नता ....कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'
पुरखों के कथनानुसार ही सही,
आज भी बुद्धिजीवी लोग कहते हैं कि
खरमास में शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
अब पुरखों की बात तो माननी ही होगी,
नहीं तो पाप लगेगा। ख़ैर ! ...
बुद्धिजीवियों के हुजूम के रहते
पाप-पुण्य तय करने वाले हम होते कौन हैं भला ? .. शायद ...
विपन्नता ....कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'
हाहाकार मचा है भारी
नैतिकता की डोर सड़ी
उठा पटक में बापूजी की
ले भागा है चोर छड़ी
ऐसे भारत के सपने कब
बनी विवशता अभिन्नता ।।
पलायन ... शेखर सुमन
"तुमने लिखना क्यों छोड़ दिया... "
"पता नहीं...
शायद अब लिखने को कुछ बचा नहीं....
और अब मैं कुछ लिखना भी नहीं चाहता,
अनजाने लोगों के दिल के तार छेड़ने के लिए
इंसान कब तक लिख सकता है... पता है,
मेरे पास पढ़ने वालों की कभी कमी नहीं रही..
लेकिन अब शायद वक़्त आ गया है कि
ज़िन्दगी के इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया जाए... "
"पता नहीं...
शायद अब लिखने को कुछ बचा नहीं....
और अब मैं कुछ लिखना भी नहीं चाहता,
अनजाने लोगों के दिल के तार छेड़ने के लिए
इंसान कब तक लिख सकता है... पता है,
मेरे पास पढ़ने वालों की कभी कमी नहीं रही..
लेकिन अब शायद वक़्त आ गया है कि
ज़िन्दगी के इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया जाए... "




