।।उषा स्वस्ति।।
आज की सुबह आगाज़ करती हूँ प्रस्तुत विचारपूर्ण उक्तियों से..
"नाश भी हूँ मैं अनंत विकास का क्रम भी
त्याग का दिन भी चरम आसक्ति का तम भी,
तार भी आघात भी झंकार की गति भी,
पात्र भी,मधु भी,मधुप भी,मधुर विस्मृति भी
अधर भी हूँ और स्मित की चाँदनी भी हूँ"
महादेवी वर्मा
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सिंधु का उच्छवास घन है
तड़ित तम का विकल मन है
भीति क्या नभ है व्यथा का
आँसुओं में सिक्त अंचल
स्वर अकम्पित कर दिशाएँ
मोड़ सब भू की शिराएँ
गा रहे आँधी प्रलय
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क्या आपको याद है कि अपने बचपन में विवाह, सगाई, बच्चे के जन्म, जड़ूला आदि पर होने वाले जीमन में नीचे बैठकर पंक्ति में खाना होता था .अभी भी कई स्थानों पर, अवसरों पर ऐसा जीमन होता है . ..
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बहुत दूर है तुम्हारे घर से
हमारे घर का ये किनारा
पर हम हवा से पूछ लेते हैं
क्या हाल है अब तुम्हारा
यूँ तो आती जाती बदली
तुम्हारी राह पे जब कौंधती है
हम चौंक उठते हैं देखकर
छुपा है इसमें तुम्हारा इशारा
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'अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाते हुए
( मुक्तिबोध, अँधेरे में)', अपनी लफ्फाजी के इस फुलौने को फूंकने के पहले 'मंगलाचरण' के अंदाज़ में मैं सुन्दरकाण्ड की एक चौपाई और एक दोहे का स्मरण करना चाहूँगा जिसका सम्बन्ध विभीषण रावण संवाद से है. दोहे से तुलसीदास ने संवाद का श्री गणेश किया है ..
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( मुक्तिबोध, अँधेरे में)', अपनी लफ्फाजी के इस फुलौने को फूंकने के पहले 'मंगलाचरण' के अंदाज़ में मैं सुन्दरकाण्ड की एक चौपाई और एक दोहे का स्मरण करना चाहूँगा जिसका सम्बन्ध विभीषण रावण संवाद से है. दोहे से तुलसीदास ने संवाद का श्री गणेश किया है ..
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कुछ दराज़ों में डाल रक्खी हैं ...
चूड़ियाँ कुछ तो लाल रक्खी हैं
जाने क्यों कर संभाल रक्खी हैं
जिन किताबों में फूल थे सूखे
शेल्फ से वो निकाल रक्खी हैं
आदरणीय दिग्म्बर नासवा जी के खूबसूरत गज़ल
से आज की बातें यहीं तक कल यहीं पर नई लिंकों के साथ
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह...✍



