सादर अभिवादन
धर्म कोई भी ना होता, देशधर्म ही होता धर्म एकमात्र
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
सादर अभिवादन

हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...
जब किसी यौगिक शब्द शब्द से किसी रूढ़ अथवा विशेष अर्थ का बोध होता है अथवा जो शब्द यौगिक संज्ञा के समान लगे किन्तु जिन शब्दोँ के मेल से वह बना है उनके अर्थ का बोध न कराकर, किसी दूसरे ही विशेष अर्थ का बोध कराये तो उसे योगरूढ़ कहते हैँ।
आप भुलाकर देखो, हम फिर भी याद आएंगे,
आपके चाहने वालों में,
आपको हम ही नज़र आएंगे,
आप पानी पी-पी के थक जाओगे,
पर हम हिचकी बनकर याद आएंगे.
देखती रह गयी तलवारें सब, बिछड़ते वक्त..
उनके लफ्जों का वार इतना कमाल का था।
कहीं यादों का मुकाबला हो तो बताना जनाब..
हमारे पास भी किसी की यादें बेहिसाब होती जा रही हैं।
एक ही हादसा तो है और वो यह के आज तक
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई
बाद भी तेरे जान-ए-जां दिल में रहा अजब समाँ
याद रही तेरी यां फिर तेरी याद भी गई
दिल की हर बात कहना कोई जरूरी नही,
अपने लबों पर खामोशी सजाए रखिये|
तनहा न रहोगे इस दुनिया में कभी भी
यार न सही, एक दुश्मन बनाए रखिये|
क्या तुम्हारा बेटा किसान बनने के लिए तैयार हुआ?"
"बेरोजगारी दूर करने के लिए नौकरी ना मिलने के कारण अपना धंधा शुरू करना गलत नहीं है .. । पढ़ा-लिखा नौजवान है, देश को आगे बढ़ानेवालों में से एक होकर चलेगा। "
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शीर्षक पंक्ति: आदरणीया आशा लता सक्सेना जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
कोविड-19 की चौथी लहर की चर्चा रफ़्तार पकड़ रही है। सावधानियों का
पालन कीजिए और अपने स्वास्थ्य का ख़याल रखिए।
गुरुवारीय अंक में पाँच रचनाओं के लिंक्स के साथ उपस्थित
हूँ-
आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
कदम पीछे नहीं लौटाना
मन में दृढ संकल्प रखना
तुम्हारे लिए हम क्या कर सकते है
केवल प्रार्थना के अलावा।
वह जो बच्चा
मेरे मुहल्ले में
आइसक्रीम बेचता है,
उसका भी मन करता है
कि वह भी खाए
कभी कोई आइसक्रीम.
नए रचनाकारों के लिए आवश्यक जानकारी
सआदत हसन मंटो की ये पांच लघुकथाएं...इंसानियत के परखच्चे उड़ा देती हैं
सआदत हसन मंटो भारतीय
उपमहाद्वीप के महान उर्दू कहानीकार थे। उनकी कहानियां भारत-पाक विभाजन के दंश का
प्रामाणिक दस्तावेज हैं। बंटवारे के दर्द को बेहद गहराई से समझने, उसके संवेदनात्मक व मानवीय पहलू को बेहतरीन
रूप से प्रस्तुत करने का नाम है मंटो! मानवीय त्रासदी उनकी रचनाओं में बेहद शिद्दत
से उपस्थित हुआ है, इसीलिए वे दोनों
देशों में आज भी लोकप्रिय हैं।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
सादर नमन
सोच मशीनी बनती सबकी
भावों का है सूखा
लिप्साएँ हों मन पर हावी
कैसा बनता भूखा
बंदर जैसे मानव नाचे
साधन बने मदारी।
कितनी सरलता से यह बात समझा दी गयी है कि आज मानव साधन रुपी मदारी की उँगलियों पर नाचता है ....... यदि अभी भी समझ नहीं आया तो चलिए एक और पोस्ट पढवाते हैं कि आज के युग में लोग जितना अधिक कमा रहे हैं उतना ही अपने बच्चों के प्रति विमुख होते जा रहे हैं .....
हाँ तो आधुनिक बच्चे, चूँकि अधिक एक्स्पोसेड़ हैं, उनमें जागरूकता या कहें
अंतर्जाल पर उपलब्ध ज्ञान भी अधिक है। जो बड़ों की निगरानी के अभाव में
उन्हें अनचाहे रास्तों पर धकेल सकते हैं। कच्ची उम्र में जब उन्हें मार्गदर्शन
की ज़रूरत होती है, तब उन्हें नौकरों और आयाओं के सुपुर्द कर दिया जाता है।
इस पोस्ट का शीर्षक मॉर्निंग वॉक क्यों रखा है ? मैंने पूछा है सरस जी से ...... जवाब मिलते ही बताउँगी . ......मुख्य मुद्दा शीर्षक नहीं है ...... बात है कि हम बच्चों के प्रति कितने जागरूक हैं ....... अब जागरूक होने की बात करें तो ऐसा नहीं है की लोगों को अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं होता ...... सब होता है लेकिन कब किस संगत में पड़ कर बुरी आदतों का शिकार हो जाते हैं और अपना ही नुकसान करते रहते हैं ...... लेकिन जानते हुए भी उनको छोड़ नहीं पाते . बात केवल बुरी आदतों की नहीं है , बात व्यवहार की भी है ...... ज़िन्दगी की तल्खियाँ मन पर किस कदर हावी हो जाती हैं उनको महसूस कीजिये इस कहानी में .....
'ओहो! कितना प्यार करती हो न तुम उनसे..! ' न जाने मन के किस कोने से एक तंज भरी आवाज आई थी।
साथ रहते-रहते तो सभी को प्यार हो जाता है...क्या हुआ जो उनके बीच का प्रेम चुक गया। न, चुका नहीं था, सच तो यह है कि प्यार जैसा लगा था, पर प्यार था ही नहीं... प्यार न हो, न सही, मगर एक बंधन तो है, जिसमें बंधे है दोनों। वैसे भी कितने शादीशुदा जोड़े हैं, जिनके बीच प्यार नदी सा बहता और सागर सा उफनता है! मगर रहते हैं न साथ... और इस रिक्तता की भरपाई के लिए ही तो सब बच्चे पैदा करते हैं। सहसा उसे अपने बेटे अंशु की याद हो आई।
अंशु का चेहरा आंखों में कौंधते ही भय की एक तेज सी लहर कृतिका की रीढ़ में दौड़ गई।
उम्मीद है कि मन के घेरे से निकल एक लम्बी साँस तो ज़रूर ली होगी ....... अब इस गंभीर कथानक के बाद लग रहा है कि कुछ मन को प्रफ्फुलित करने के लिए हल्का - फुल्का विषय लाया जाय ........... हँसी ख़ुशी का माहौल रहे ...... तो चलिए ले आई हूँ एक बतकही ...... मजेदार कहानी ......
इस किस्से को पढ़ते हुए मैं सोच रही थी कि लेखक की कल्पनाशीलता भी कितनी कमाल की है ....किस तरह बात से बात निकालते हुए कहानी बुन डाली है ....... चलिए कल्पना को छोड़ अभी यथार्थ की बात करें ........उम्र दर उम्र बीतते हुए कितनी स्मृतियाँ संजो ली जाती हैं और उनको एक धरोहर की तरह ही सहेज ली जाती हैं ..... पढ़िए इस रचना में ...
एहसास भर से स्मृतियाँ
बोल पड़ती हैं कहतीं हैं-
तुम सँभालकर रखना इसे
अकाल के उन दिनों में भी
खनक थी इसमें!