सादर अभिवादन
आज की अतिथि चर्चाकार हैं
आदरणीया सुधा देवरानी जी
आज की अतिथि चर्चाकार हैं
आदरणीया सुधा देवरानी जी
प्रिय सुधा जी की यथार्थ परक सुघड़ लेखनी
से हम सभी परिचित है आज उनकी
रचनात्मकता का एक और रूप इस शानदार
अंक के रूप में आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है-
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बात सिर्फ नज़रिए की है
कौन किस नज़रिए से क्या कहता है ,करता है
कौन किस नज़रिए से उसे सुनता,और देखता है
और इन सबके बीच
एक तीसरा नज़रिया
उसे क्या से क्या प्रस्तुत कर देता है,
जाने क्या मायने रखता है सबके लिए !!!
जी ,सही कहा सबका अपना-अपना नजरिया है । फिर भी एक प्रश्न तो बनता ही है न कि
आखिर सृष्टि की चिंता जो है।
अस्त्र - शस्त्र निर्माण कर
स्वयं का ही संहार कर
क्या चाहते हो मानव ?
इस सृष्टि का विनाश कर ।
रोकने से भी कहाँ रुक रहा है कोई । सृष्टि की परवाह किये बगैर मनमानी करता मनुष्य आज सृष्टि के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं।यही तो है
स्वयं का ही संहार कर
क्या चाहते हो मानव ?
इस सृष्टि का विनाश कर ।
रोकने से भी कहाँ रुक रहा है कोई । सृष्टि की परवाह किये बगैर मनमानी करता मनुष्य आज सृष्टि के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं।यही तो है
और व्यथा से घट झरा है
वेदना की दामिनी से
शूल का भाथा भरा है
नित सुलगती ताप झेले
अध जली काठी जली जो।।
अरे ! विश्व की तो क्या यहाँ तो घर की समस्याएं सुलझाना मुश्किल है। आइये
*आपकी नहीं हम सबकी सहेली* से सीखें घर की समस्याएं सुलझाकर स्मार्ट ग्रहणी बनना ।
नई झाड़ू के उपर की पॉलिथीन हटाकर झाड़ू को फर्श पर रखे। मोटी पुरानी कंघी से जैसे हम बालों को सुलझाते है ठीक वैसे ही झाड़ू को सुलझाए। झाड़ू को पलट-पलट कर सभी ओर से सुलझाए। ऐसा करने से झाड़ू का पूरा भूसा निकल जाएगा।
और अंत में में एक अनुरोध प्रिय श्वेता जी से कि
*एक थी सोमवारी* के बाद अन्य छःवारी एवं हम इंतजार में बैठे हैं कि कब आयेगी अगली कहानी की बारी।
वो फिर एक बार और आयी बस जाने किस संकोच में वो नहीं आती थी। एक दिन अचानक उसी रस्ते पर मिली मैं तो पहचान नहीं पायी , वो खुश लग रही थी, आज चटख गुलाबी दुपट्टा कंधे पर डाला हुआ था उसने।आँखों में काजल की महीन रेखा , बालों को खोला हुआ था घुँघराले बालों की लट उसके होठ़ो को चूम रहे थे। हाथों की लाल हरी और सुनहरी चुडि़यों की मोहक खनक बार बार लुभा रहे थे। मैंने कहा क्या बात है बहुत सुंदर लग रही हो तो वो खिलखिला पड़ी ।तांबई गालों पे लाली छा गयी , शरमाते हुये पैर के अँगूठे से मिट्टी कुरदने लगी फिर हँसकर भाग गयी।
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और अब अंत में एक सच भी बता ही देती हूँ कि नकल करने की बहुत कोशिश की, पर किसी ने सच ही कहा है कि नकल के लिए भी अकल चाहिए होती है।
धन्यवाद सहित क्षमाप्रार्थी--सुधा देवरानी🙏🙏




