घर- आंगन के हर कोने से
स्मृतियों के तो तार जुड़े है
कौन तार गठरी में बाँधू
सब के सब अपने लगते हैं
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दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
घर- आंगन के हर कोने से
स्मृतियों के तो तार जुड़े है
कौन तार गठरी में बाँधू
सब के सब अपने लगते हैं
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कल फिर
कल फिर
हाज़िर हूँ...! अंतिम उपस्थिति दर्ज हो...
आज का मुख्य चर्चा का विषय है कि जब अनुस्वार को
व्यंजन मानते हैं तो इसे वर्ण में किन नियमों के अंतर्गत
परिवर्तित किया जाता है....इसके लिए सबसे पहले हमें
सभी व्यंजनों को वर्गानुसार जानना होगा
किन्तु यदि पाँचवे अक्षर के
आधे उच्चारण के बाद उसी वर्ग का
वर्ण नही आता है तो
हम बिंदु नही लगा सकते।
अंग्रेज़ी में तो शब्दकोश का सहारा लेना पड़ता है,
पर हिन्दी में बस सही उच्चारण मालूम हो,
कुछेक नियमों का ज्ञान हो और सही लिखने की इच्छा हो,
तो सब सही हो जाता है।
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पूर्ण विराम...
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काश कि हमसभी को पूरी ज़िम्मेदारी से याद रहता कि हमने अपनी स्वतंत्रता के लिए किन बेशकीमती रत्नों को खोया है।
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चाय की यह फिलॉसफी हर एक की ज़िंदगी का सच है जरूर पढ़िए आप ख़ुद को किरदार के रूप पायेंगे-
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अपनी सांस्कृतिक धरोहरों के प्रति हमारी संवेदना हमारा सम्मान सदैव विशिष्ट है।
एक म्यूजियम जैसा बनाया गया है। वहां जालियांवाला बाग कांड का फिल्मांकन कर उसकी प्रदर्शनी लगातार होती रहती है। एक चौंकाने वाली बात यह भी नजर आई कि म्यूजियम में प्रभावित लोगों के परिवार वालों के बयान को लिखित रूप से उद्धृत किया गया है। सोचने की बात यह कि उसमें बयान देने वालों के नाम के साथ जाति का जिक्र किया गया है। पता नहीं इसके संयोजकों ने ऐसा क्यों किया? जाति का विवरण मुझे असहज ऐसा लगा।
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और चलते-चलते अन्तर्मन के भावों की महीन बुनावट और परिस्थितियों पर आधारित व्यवहार विश्लेषण को शब्द देती गहन अभिव्यक्ति
उसकी तन्द्रा
भंग करते हुए स्नेहा ने कुछ पैकेट ऋतु को भी पकड़ा दिये । ऑटो में बैठते हुए माँ की दुख में डूबी आवाज़ कानों में
पड़ी - "लड़की कैसी नीम सी खारी हो गई है तू !" स्नेहा की थोड़ी देर पहले की तल्ख़ी याद करते हुए ऋतु ने माँ को समझाते हुए कहा -"नीम भी बुरा नहीं होता माँ.., आजकल
तो उसकी गुणवत्ता सभी मानते हैं ।"
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कल का विशेष अंक लेकर
आ रही हैं प्रिय विभा दी।
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शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अरुण चंद्र रॉय जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।
आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
मेरे सामने चींटियाँ
चल रही हैं एक दूसरे के पीछे
हम सभी चले जा रहे हैं कहीं
करते हुये भरोसा
पत्ते गुमसुम,
पसीने की जैसे
नदी बह रही है,
पर आज मौसम अच्छा है,
अविकसित या अल्पविकसित ही रह कर
हम उसी छत के नीचे हैं खड़े हुए
श्राद्ध के दिन आते हैं वो भाव से पृथ्वी पर
श्रद्धा के सुमन अर्पित हैं,
ग्रहण कर लें वो आशीष देते हुए
हर सब्जी के दामों में,वे लगे दो-दो रुपए घटवाने।
एक बूढ़ी सब्जी वाली, जो दिखती चेहरे की भोली।
मुट्ठी भर धनिया-पत्ती का वह, दाम दो रुपए बोली।
पति महोदय हंसकर बोले,मुफ्त में दो धनिया पत्ती।
बूढ़ी सब्जी वाली के चेहरे पर,साफ दिखी आपत्ति।
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आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले गुरुवार।
रवीन्द्र सिंह यादव