निवेदन।


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मंगलवार, 26 नवंबर 2019

1592..आज का अंक फिर एक बन्द ब्लॉग से

सादर अभिवादन..
आज का अंक फिर एक बन्द ब्लॉग से
हकीकत मे इस ब्लॉग में 
2017 के बाद से कोई नई प्रस्तुति नहीं
बन्द नहीं कहना चाहिए
क्यूँकि इस ब्लॉग की लेखिका
फेसबुक में सक्रिय है
ब्लॉग लेखिका हैं नईदिल्ली निवासी 
सखी नीलिमा शर्मा जी

तो चलिए..
इस बागीचे के चुनिन्दा पुष्पों पर एक नज़र
हम 2013 से 2017 की ओर आएँगे
अप्रैल 2013..
तन्हाई
सिर्फ मेरे हिस्से में ही नही आई हैं
तेरी हयात में इसने जगह बनायीं हैं
सुनो!!!
यूँ तनहा रहने का
शउर
सबको नही आता !
तनहा होने में
घंटो खुद को खोना होता हैं

मई 2013
कितनी ओल्ड फैशंड हो तुम 
इत्ती बड़ी सी बिंदी लगाती हो !!!
कल सरे राह चलते चलते 
कह गयी एक महिला 
जिसकी आँखों पर पर तो 
ढेर सारा काजल था पर 
माथा सूना सा 
नही जानती वोह 
बिंदी का फैशन से क्या लेना 


3सितम्बर 2015
कुछ आईने टूट कर ही
चुभते हैं ,साबुत भी
कभी मुकम्मल तस्वीर न थे जो
कभी बेचारगी कभी मासूमियत
कभी मक्कारी का मुखोटा ओढ़े
यह आईने कई चेहरे लिय
उम्र भर तलाशते अपना वजूद
और इक छायाप्रति तक न पाकर
बिलबिला उठते अंधेरो में



12 अक्टूबर 2015
गिरह,गाँठें

फर्क लफ्जों का नही
महसूस करने का होता हैं
गांठो को
उनकी गिरहो को
उनके होने को
उनकी वजूद को



3 दिसम्बर 2015
मेरा शहर आवाज़ेंं लगा रहा

सपनेंं देखतीहूँ
मैंअक्सर आजकल
हरी वादियों के
घंटाघर कीबंद घडियोंं में
अचानक होते स्पंदन के
बाल मिठाई के
बंद टिक्की और
खिलती हुयी धूप के




और इस बार के हमक़दम
का विषय भी इसी ब्लॉग

शहर

हर शहर का  अपना  सँगीत होता  हैं 
 कोई सरगम  सा बजता हैं  कानो में 
 कोई गाडियों के हॉर्न सा चीखता हैं 

रचना भेजने की
अंतिम तिथिः 30 नवम्बर 2019
प्रकाशन तिथिः 2 दिसम्बर 2019
प्रविष्ठिया मेल द्वारा सांय 3 बजे तक

सादर।

सोमवार, 25 नवंबर 2019

1592 हम-क़दम का छियानबेवाँ अंक.... बेटियाँ

स्नेहिल अभिवादन
-----------
सोमवारीय विशेषांक में आपसभी का हार्दिक अभिनंदन करती हूँ।

 "बिटिया"
 शब्द आते ही आँखों के सुसुप्त-जागृत परदों के पार मन को भावों की लहर धीरे से छू जाती है। एकदम निर्मल कल-कल,छल-छल,धाराओं सी पावन,चाँदनी-सी स्निग्ध,पुष्पों-सी कोमल अगाध स्नेह के
 ज्वार का प्रतिबिंब होती हैं बेटियाँ।
 बेशक बेटियों के लिए हमारे परिवार और समाज में हो रहे मंथर गति के परिवर्तन को महसूस किया जा सकता है।
  चंद पढ़े-लिखे,समझदार तबके में बेटियों की स्थिति में सुधार सामाजिक दृष्टिकोण से बेहद सुखद है। 

  पर दुःख होता है जब अपने शहर की बस्तियों में देखती हूँ एक बेटा की आस लिए तीन-चार-पाँच बेटियों की कतार लगाते हुये विपन्न और सुविधाओं से वंचित समाज के परिवारों को। बेटियों को दहेज के नाम पर प्रताड़ित होते हुये,कम पढ़ी लिखी लड़कियों को निरीह जानवरों से भी बदतर अपना जीवन व्यतीत करने पर मजबूर होते हुये। माँ-पिता की विविशता में अपनी बलि चढ़ाते हुये। 
  आज भी ऐसे परिवारों की संख्या ही ज्यादा है जो बेटों और बेटियों में स्पष्ट अंतर उंगलियों पर गिना देंगे।

मुझे लगता आज हम अभिवावकों को जागरूक होने की आवश्यकता है,बेटों और बेटियों में फर्क़ करने की बजाय एकसमान रुप से पालन करना और उन्हें आत्मसम्मान भरा जीवन देना हमारी ज़िम्मेदारी है।



बेटियों की प्रेरक उपलब्धियों से ज्यादा
उपेक्षित बेटियों का दर्द ,अनकही दास्तान नित आत्मा झकझोरती है।
नभ,अंतरिक्ष,धरा,नीर के कण-कण में पाँव छपछपाती कहानियोंं से ज्यादा अस्तित्वहीनता बेटी की कुहक हृदय मरोड़ती है।

★★★

बेटियों के संदर्भ में कविताएँ अनगिनत लिखी गयी हैं।

आज पढ़िये हमारे चिट्ठाजगत से चिरपरिचित रचनाकारों की अनमोल कृतियाँ-

★★★★★

आदरणीय साधना वैद
दिन भर तेरी धमाचौकड़ी, दीदी से झगड़ा करना,
बात-बात पर रोना धोना, बिना बात रूठे रहना,
मेरा माथा बहुत घुमाते, गुस्सा मुझको आता है,
लेकिन तेरा रोना सुन कर मन मेरा अकुलाता है !


आदरणीय आशा सक्सेना
जब पहला कदम रखा दुनिया में
ख़ुशी चारो ओर फैली
पहला शब्द माँ कहा मौसी हुई निहाल
क्यूँ न चूम लूं तुम्हें
तुमसी बिटिया  पा कर
दी बधाई तुम्हारी जननी को


आदरणीय उर्मिला सिंह
आज वही नन्ही गुड़िया
रिस्तों के प्यारे बंधन में 
पत्नि  माँ बहू बन, 
रिश्तों पर अपना प्यार लुटाती
जिसे हम सभी प्यार से कहते 
मेरी  बिटिया रानी!! 


आदरणीय सुजाता प्रिय
पेट में पलती बिटिया बोली-
मुझे न मारो माँ- पिताजी।

जनम लेते ही बिटिया बोली-
मुझे न फेको माँ-पिताजी।

दूध पीती बिटिया बोली-
गले लगा लो माँ-पिताजी।


आदरणीय कुसुम कोठारी
अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजे ।
प्रभु मुझ में ज्वाला भर दीजे,
बस  ऐसी  शक्ति  प्रभु  दीजे,
अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजे।
आंख उठे जो लिए बेशर्मी
उन आंखों से ज्योति छीन लूं ,



आदरणीय अनीता सैनी
खिलखिलाती हँसी से तुम्हारी, 
सुख हृदय में उभर आया,  
न्यौछावरकर जीवन अपना,  
यही पाठ है पढ़ाया,   
बिठूर की बिटिया-सा साहस सीने में,  
स्वाभिमान की चिंगारी है जलायी |


आदरणीय सुबोध सिन्हा
क ख ग घ ... ए बी सी डी ..
सब तो आपने मुझ बिटिया को
बहुत पढ़वाया ना पापा ?
अब "एक्स-वाई" भी तो
समझा दो ना पापा !
अगर भईया बना "वाई" से
वंश-बेल माना आपका
पर मुझ बिटिया में भी तो
है ही ना "एक्स" आपका
फिर मुझ से तथाकथित
मोक्ष क्यों नहीं पापा !???
पूछ रही है बिटिया ...

★★★★★


हमक़दम का यह अंक आपको
कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियायें
उत्साह बढ़ाती हैं।

हमक़दम का अगला विषय
जानने के लिए कल का अंक अवश्य पढ़िये।

आज्ञा दीजिये।

#श्वेता


रविवार, 24 नवंबर 2019

1591....क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए ।।


जय मां हाटेशवरी.....
कल सोने से पहले पड़ा कि.....
महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे  होंगे....
पर जब सुबह सोके उठा तो.....
मुख्य खबरों में था.....
आज फडणवीस जी की मुख्य मंत्री के रूप में   शपत.....
जिस को अब भी हो सियासत पे यक़ीन
उस को ये मुल्क दिखाया जाए

स्वागत है आप सभी का.....
पेश है आज के लिये मेरी पसंद....
राही मासूम रजा जी की इन पंखतियों के साथ.....

क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए ।।
क्‍या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए।
हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं
जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए।
इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन
जाने क्‍या बातें करते हैं आपस में हमसाए।।
हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही
आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए ।।
क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए ।।


विस्थापित होते शब्द
दोस्त को अब 'फ्रैंड्' कहते
प्रेमी 'बॉयफ़्रेंड' हो गया। 
दिल टूटना 'ब्रेकअप' हुआ
क्षमा का 'सॉरी' हो गया
शादी को 'मैरिज' कहते
प्यार का 'लव' हो गया।



इस जीवन पथ पर....
चलेंगे साथ मिलकर,
सुख दुःख मे पकड़े एक दूसरे का हाथ|
एक दूसरे को सहारा दे,
खुशी खुशी चले साथ मिलकर|
इस जीवन पथ पर.....

पढ़ा-लिखा इंसान भी अंधविश्वासी क्यों और कैसे बनता हैं?
हर इंसान अपनी समस्याओं से जल्द से जल्द मुक्ति पाना चाहता हैं। इसलिए लोग इन विज्ञापनों के जाल में फंस जाते हैं। जो पढ़ा-लिखा इंसान पढ़ी हुई बातों पर चिंतन-मनन
करता हैं, वो इंसान अंधविश्वास के मकडजाल से निकल जाता हैं। लेकिन जो इंसान ऐसा नहीं करता वो हाथी की तरह हो जाता हैं। मतलब जिस तरह एक विशालकाय हाथी को उसके
बचपन में मजबूत जंजीरों से बांध कर उसे इस बात का एहसास करवाया जाता हैं कि वो इन जंजीरों को नहीं तोड़ सकता। बचपन के इसी एहसास के कारण एक वयस्क विशालकाय हाथी
ताउम्र एक पतली सी जंजीर से बंधा रहता हैं!!
इस तरह बचपन से हुई अपनी परवरिश के कारण ही पढ़ा-लिखा इंसान भी अंधविश्वासी बन जाता हैं। दोस्तो, हम हर विषय की दो-दो परिभाषा रखते हैं इसलिए दुविधाग्रस्त हो
जाते हैं। कुछ लोगों का कहना होता हैं कि हमारे पुर्वज ऐसा मानते थे इसलिए हम भी मानेंगे। हमारे पुर्वज कंद-मुल खाकर जंगलों में नग्न रहते थे, तो क्या हम भी

टुकड़ा टुकड़ा आसमान
मैंने बूँद बूँद अमृत जुटा उसे
अभिसिंचित करने की कोशिश की थी
तुमने उस कलश को ही पद प्रहार से
लुढ़का कर गिरा क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
और अगर हूँ भी तो क्या यह दोष मेरा है ?

संस्कार संक्रमण
अपने आँगन के पौधों को
क्यों काँटों से हम तोप रहे?
मुस्तफ़ा खाँ 'मद्दाम' का
समृद्ध उर्दू-हिंदी शब्दकोश
क्यों न हम रोक सके थे...?
'बुल्के' का रामकथा पर शोध
भाषा कल-कल बहता नीर
सरहदों में बाँध क्यों रोक रहे?
मत बनाओ नस्लों को
साम्प्रदायिकता का शिकार
संकीर्ण मनोवृत्तियों से पनपी
'कूपमंडूकता' है एक विकार

बेटी के माँ बाप
तुम्हारे मम्मी पापा का क्या हाल है, बहु? मिलने गयी ?
बहुत अच्छे  से हैं।  मिलने नहीं जा सकी।  काफी महीने हो गए मिले, फोन पर बात हो जाती हैं।
हाँ -हाँ , ठीक भी है , अपनी गृहस्थी  सम्भालो , नौकरी करो।
मैंने इक मुस्कान के साथ सर हिलाया।
ह्म्म्मम्म और इक बार फिर से वही शब्द '''''''''''''''''''''''''
''तुम नहीं समझोगी माँ बाप का दुःख, बहु। हम बूढ़े  यहां अकेले।  हमने सारी  ज़िंदगी बेटों पर ही लगा दी।  सारा जीवन बस इनके लिए सेक्रेफाइज़ करते रहे।
इक मुस्कराहट के साथ इक बार फिर से पैरी पैना कर के कार में बैठ  गयी।
कार सरपट सड़कों पे दौड़े जा रही थी और साथ ही दौड़ने लगी मेरी सोच भी।  अब खुद से ही संवाद करने की आदत पढ़ सी गयी है।

हत्या
सभी भूर्ण लड़कियों के नहीं है,बहुत से लड़के भी थे।  लड़के ! ये  क्या कहा रहे हो तुम?   कोई अपने लड़के को  क्यूँ मरना चाहेगा ?  लड़की है  या लड़का उन्हें क्या
पता था।
उन्हें  बस एबोर्सन से  मतलब था और हमें पैसे से।  दोनों के बीच खामोशी छा गई।

अंतिम विकल्प या दूसरा अध्याय 
 जो जीवित दिखाई दे रहे,
वे क्या सचमुच जीवित है
जिनके आगे हम राम नाम की सत्यता का जाप करते हैं
वे क्या सचमुच मूक बधिर हो चुके हैं ?
सत्य की प्रतिध्वनि मिल जाये
तो सम्भवतः जीवन का रहस्य खुले ...
धन्यवाद।

शनिवार, 23 नवंबर 2019

1590... मुखौटा


सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

कब कौन कितना किसको
अपना निशाना बना रहा
कंधे इतने मजबूत नहीं
बंदूक रखने के पहले तौल तो लेते
उतना ही बोलना जितना जरूरी हो
सीखने में एक उम्र गुजर गई
ना जाने कब पीछा छोड़ेगा दो चित्तापन
और जाने कब उतरा जा सकेगा

फैल जाता है
जीवन का खालीपन
और गहराता है
लोग सांत्वना के
दो बोल बोलते हैं
और हार का एहसास

मन ही मन में हैं गारियाँ देतें
पर ऊपर से मुस्कुराते हैं
रखते दिल के अंदर खोट ही खोट
और सिर्फ झूठा प्यार जताते हैं
यहाँ सब दिखते हैं तो गहरे गहरे पर
ये मुखौटे कोई उतार नहीं पाते हैं
राम राम मुख से हैं सब जपते
और रावण बन पीठ में खंजर घोप जाते हैं

जिसका चेहरा जितना बनावटी
वह उतना ही सफल है
छल प्रपंच से भरे खेल में
उसकी दांव प्रबल है 
अपनापन का भाव कहाँ यहाँ पर
केवल स्वार्थ निहित है

मुखौटे

रामलीला में अगर कुंभकर्ण का मुखौटा है तो वह कुंभकर्ण का ही पात्र है।
जीवन में यह द्वैत है। अगर जीवन पर रंगमंच खेला जाए तो
फिर से मुखौटे लगाने होंगे जो वास्तविक चेहरे से भिन्न होंगे,
क्योंकि रंगमंच में तो सच दिखाना है। इसलिए
आधुनिक रंगमंच में कई भावों को प्रस्तुत करने के लिए मुखौटे लगते हैं।

दो चेहरे

देखते हैं आयना तो पहला चेहरा नजर आता है,
और दूसरा तो बस आंखे बंद करने पर दिख जाता है।
जिन बुराइयों को छिपाता है तू जमाने से,
उन्हें दूसरा चेहरा ही तुझे दिखाता है।
फिर भी न जाने क्यों ?
तुझे पहला चेहरा ही भाता है।

><
फिर मिलेंगे

इस सप्ताह का विषय
छियानबेवां विषय

बिटिया
उदाहरण
आज भी तो नवजात बिटिया के 
जन्म पर,भविष्य के भार से 
काँपते कंधों को संयत करते
कृत्रिम मुस्कान से सजे अधरों और
सिलवट भरे माथे का विरोधाभास लिये
"आजकल बेटियाँ भी कम कहाँ है"
जैसे शब्दांडबर सांत्वना की थपकी देते
माँ-बाबू पर दया दृष्टि डालते परिजन की
"लक्ष्मी आई है"के घोष में दबी फुसफुसाहटें
खोखली खुशियाँ अक्सर पूछती हैं
बेटियों के लिए सोच ज़माने ने कब बदली?
कलमकारः सखी श्वेता सिन्हा

अंतिम तिथिः 23 नवम्बर 2013
प्रकाशन तिथिः 25 नवम्बर 2013

प्रविष्ठिया मेल द्वारा सांय 3 बजे तक

शुक्रवार, 22 नवंबर 2019

1589 ...बिन धागे की सुई सी बन गई है ये ज़िंदगी

स्नेहिल अभिवादन
-------
शुक्रवारीय अंक में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है।
राजस्थान के  सबसे बड़े खारे पानी के सांंभर झील
प्रवासी पक्षियों की कब्रगाह बन गयी अब तक करीब 
18,000 पक्षियों की मौत हो चुकी है।

सैकड़ों मील दूर, महाद्वीपों के पार से हर साल सर्दियों में राजस्‍थान की सांभर झील में आने वाले हजारों प्रवासी पक्षियों को देखना हर पक्षी प्रेमी का सपना होता है। लेकिन इस साल सांभर झील का पानी
दुःस्वप्न में बदल गया। प्रवासी और स्‍थानीय पक्षियों की होने वाली मौतों के बीच विशेषज्ञ इसके लिए जिम्‍मेदार कारण पर एकमत नजर नहीं आते। लेकिन सब एक बात कह रहे हैं कि अगर जल्‍द ही इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया गया तो और पक्षियों की जान जाएगी।
पर्यावरण प्रदूषण, पारिस्थितिकी असंतुलन कारण
चाहे कुछ भी हो पर प्रकृति की यह विनाशकारी चेतावनी 
अनसुना करना मनुष्य के अस्तित्व के
लिए भी कम घातक नहीं।
काश! कि हम समझ सकते।


ये कशमकश है ज़िंदगी
कि कैसे बसर करें ......

चादर बड़ी करें या,
ख़्वाहिशें दफ़न करे.....


कविताएँ तो आप प्रतिदिन पढ़ते हैं

आज पढ़िये कुछ गद्य रचनाएँ-



यक़ीन कीजिए, हमारी यह अनुभूति निरा लफ़्फ़ाज़ी नहीं है। बहुत बार तो कुछ अहसास आगत की भौतिक हलचलों की आहट भी होते हैं। अर्किमिडिज का पानी से भरे टब में अपने को हल्का महसूस करना विज्ञान जगत की एक क्रांतिकारी अनुभूति थी। विज्ञान की दुनिया ऐसे ढेर सारे वृतांतो और दृष्टांतों से पटी पड़ी है, जहाँ कल्पना ने ठोस यथार्थ, सपनों ने हक़ीक़त और अनुभवों ने ज्ञान की भूमि तैयार की। जैव रसायन शास्त्री केकुल  के सपने में साँप का अपनी पूँछ पकड़ना एक ऐसा ही विस्मयकारी सपना था जिसने बेंज़ीन की बनावट का हक़ीक़त दिया।



#प्रकृति_माँ (कुदरत) के लिए उसकी हर संतान बराबर है। मतलब, एक इंसान के जान की कीमत सही मायनों में एक शेर/हाथी/पक्षी/साँप/कुत्ता/बिल्ली/... इत्यादि के समान ही होती है, ये बात अलग है कि इंसान अपनी महत्वाकांक्षा और अहं के रहते यह बात मान ही नहीं सकता।

आजकल की परिस्थितियों में जहाँ प्रकृति को नष्ट कर देने के लिए हम उद्यत हैं, बेगुनाह जीव/जंतुओं के बारे में सोचकर रोना आ जाता है। अरे, उन्हें तो अपनी नाक पर रूमाल बाँधनी भी नहीं आती, मास्क भी वितरित कर दिये जायें तो क्या फ़ायदा?



आज जंगल इतिहास हो गया और गांव जवान शहर। पर इस शहर के बसने, जंगलों के विनाश और एक नए भविष्य की नई इबारत के पीछे बरतानिया हुकूमत का षडयंत्र है। उन्हें दरअसल मधुपुर नहीं बसाना था। मधुपुर तो महज एक गांव था जैसे आज साप्तर है या फागो या कुर्मीडीह। पर अंग्रेज बहादुर जब सन 1855 और 1857 में संताल लड़ाकों और भारतीय फौजियों के विद्रोह से परेशान हो गए और हताशा फैलने लगी तब रेल ब्रिटिश हुकूमत का नया हथियार बन गई। 



स्त्रियों को चाहिए कि वे पुरुष को अपनी हर समस्या का 'समाधान केंद्र' न समझें। कभी उनकी भी सुनें। परेशानियाँ उनके जीवन में भी उतनी ही हैं। आपकी समस्याओं और रोज के बुलेटिन में उलझ वे अपना ग़म बाँट ही नहीं पाते कभी! दर्द उन्हें भी होता है, डर उन्हें भी लगता है पर आपकी रोज की हाहाकार ने उन्हें सुपरमैन, बैटमैन और चाचा चौधरी बना डाला है।



दरअसल इसके बीज भी हमने ही रोपे हैं। समाज को जाति, उपजाति और धर्म के बाड़े में बाँट कर। हमने कभी सोचा ही नहीं कि जब तक इस जाति, उपजाति और धर्म के परजीवी अमरबेल पनपते रहेंगे, तब तक हमारे ख़ुशहाली के वृक्ष  'पीयराते' (पीला पड़ते) रहेंगे।

★☆★☆★☆★

उपर्युक्त  लिखी चार पंक्तियों का मतलब
 है...

न चादर बड़ी कीजिये,
न ख़्वाहिश दफन कीजिये,


चार दिन की ज़िन्दगी है,

बस चैन से बसर कीजिये...


हम-क़दम का नया विषय

कल आ रही हैं आदरणीय विभा दीदी

एक अनोखे विषय का अँक लेकर

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

1588...ऊषा-प्रांगण में खिलते अरुणित सूरज का हँसना...

सादर अभिवादन। 

वो 
देखो! 
धुंध में छिप गया 
एक महानगर, 
गाड़ी-रेलगाड़ी  
आहिस्ता चलाओ 
दुर्घटना का है डर।  
-रवीन्द्र 


 तेरे दिए दर्दों की ही कैफ़ियत है ये ग़ज़ल
रियाज़ रोज करूं दर्द छुपा गुनगुनाने की
किन कण्ठों से गाऊँ मैं जज़्बात शौक से
भींगा लफ़्ज़ भी उदास होता शायराने की ,


 
लम्हें, महीने, घंटे, दिन, ये साल ' सदी
तन्हाईयों से आगे भी तन्हाई बढ़ गई

आने लगे हैं ख़्वाब में, अब रंग सौ नज़र
जब से बसे हो आँख में, बीनाई बढ़  गई

 नादां है बहुत
कोई समझाये दिल को
डगमगा रही नौका बीच भंवर
फिर भी लहरों से
जुझने को तैयार




ऊषा-प्रांगण में खिलते
अरुणित सूरज का हँसना
लोपित होता बालकपन
उर में तरुणाई धँसना
चाँदी सी सुंदर काया
उत्तुंग शिखर पर सोना
चंदा की मृदुल मृदुलता
सूरज - अभिनंदित होना




 
कुछ समय बाद ग्रामीण सभ्यता गई जो लगभग 1600 से 600 ईसा पूर्व तक मानी गई है. यह सभ्यता गंगा जमुना के मैदान में फैली हुई थी जहाँ खेती आसान थी, मौसम अच्छा था और पानी उपलब्ध था. इसे वैदिक काल कहा जाता है क्यूंकि इसी दौरान वेदों की रचना हुई मानी जाती है. पूर्व वैदिक काल में ऋग्वेद और उत्तर वैदिक काल में सामवेद, अथर्ववेद और यजुर्वेद की रचना हुई.

हम-क़दम का नया विषय

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

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