।।शुभ भोर वंदन।।
स्वर्ण ,सुख,श्री सौरभ में भोर
विश्व को देती है जब बोर,
विहग कुल की कल -कंठ हिलोर
मिला देती भू नभ के छोर;
न जाने,अलस पलक-दल कौन
खोल देता तब मेरा मौन!
सुमित्रानंदन पंत
शाख़ ए नशेमनशेमन
समंदर से बच आये दो आंखों मे डूब गये
मुकद्दर का खेल था तेरी बातों मे डूब गये ।
तस्सवुर मे ना था कोई कशिश मे खिंचते रहे
बीच धार से बच आये साहिल पर ड़ूब गये ।
दिल से दिल तक की भावप्रवण रचना..
मैं जा रहा था , उस दिन शाम के समय टहलता ,कुछ सोचता हुआ ,
उस झील के किनारे -किनारे।
सोच रहा था जिंदगी के फलसफे के बारे में ,
आज
पार कर लिया है तुमने
उम्र का सत्रहवां घेरा भी
बेशक नहीं है कोई बड़ी घटना
द मिस्ड बीट..न.. न.. इस नाम पर नहीं बल्कि हिंदी की जहीन ब्लॉग है..
प्यार बहुत करते थे मगर हमसफर न बन सके,
ये दो कमरे जो कभी घर न बन सके,
यही था दोनो का फैसला तो सिर फोड़ना कैसा,
दोहे "गुरुओं का ज्ञान"
मतलब के हैं अब गुरू, मतलब के ही शिष्य।
दोनों इसी जुगाड़ में, कैसे बने भविष्य।।
सम्बन्धों की आज तो, हालत बड़ी विचित्र।
नहीं रहे गुरु-शिष्य अब, पावन और पवित्र।।
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍


































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