शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की
रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच+ रचनाएँ-
की गई छेड़-छाड़ क़ुदरत से,
यूँ ही थोड़ी बिफर गया मौसम।
खिल उठा दिल, जब उनकी यादों का-
सहने-दिल में उतर गया मौसम।
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'ट' से शुरू होने वाले हिंदी मुहावरों की कविता (भाग-1)
ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़कर, टाँग पसारकर सोते हैं,
समय निकलने पर फिर अपनी, किस्मत को वो
रोते हैं।
ऐसे स्वाभिमान-शून्यों को, टके को भी न पूछता कोई,
उनकी हस्ती बाज़ार में बिकती, जैसे टके सेर हो कोई।
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तब रोती हुई पोती को समझाते हुए दादी बोली - न तो भारत की सरकार फेल है ना ही
विपक्ष फेल है. फेल केवल भारत की जनता है, जिसमें इस समय नेतृत्व चयन की समझ ही खत्म हो गई है.
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पापा! मुझे क्यूँ नहीं?-एक लघुकथा
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..भाई इधर तुम्हारे गार्डन में झूले पे बैठा हूँ
"शराबी भी इंसान होते है, बेचारे ने बड़ी उम्मीद से बेल बजायी होगी...
उसे तुम्हारे रूप में भगवान नजर आ रहे होंगे..
उसके बीवी बच्चे घर पर उसका इंतज़ार कर रहे होंगे,
तुम्हें उसकी मदद करनी चाहिये" पत्नी ने समझाया..
पत्नी के समझाने पर पति दोबारा बाहर गया..
तब तक अंधेरा और गहरा हो गया था, बारिश और तेज हो चुकी थी,
कुछ नजर नहीं आ रहा था ..
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव





बेहतरीन अंक
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आभार
वंदन