दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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फ़ॉलोअर
रविवार, 24 अप्रैल 2022
3373.....दो में से क्या तुम्हें चाहिए कलम या कि तलवार
शनिवार, 23 अप्रैल 2022
3372... हुँकार

हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...
शायद नाच रही थी वो माटी भी,
अपने ही एक सपूत की लिखी इस कविता की धुन में खोई –
“मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का,
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी,
समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं”.
सारा छाँटेगा अँधियार
अब विरोध का देख निकलना है दिनकर। 33
सबसे चाहें यही करार
क़लम करें हम लोग व्यवस्था का ये सर। 34
आज कान्ति का बजे सितार
पूरे भारत-बीच गूँजते अपने स्वर। 35
रण में हर ले मृत्यु को,
क्या उसे मांगने जाएगा ,
लेकर के अबलम्ब काल का
मिलने उससे पाएगा,
यदि ऐसा तू करे वीर,
तो वो तुझको धिक्कारेगी
तू तरुण देश से पूछ अरे,
गूंजा यह कैसा ध्वंस-राग ?
अम्बुधि-अंतस्तल-बीच छिपी
यह सुलग रही है कौन आग ?
प्राची के प्रांगन - बीच देख,
जल रहा स्वर्ण-युग अग्नि-ज्वाल,
अपने लब्झोको छुपाकर रखना
कभी मेरी कविताके लिये काम आंयेगे
अपने होठोकी लाली बचाकर रखना
कभी गुलाबोको शरमानेमे काम आंयेगे
अपनी प्यास बरकर्रार रखना
तभी तो इस बादलको बरसने काम आयेगे आप..
शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022
3371.....जड़ नहीं चेतन हूँ मैं
सोचा रहूँ यहाँ मंगल में,
टूटी यह आशा भी पल में,
देखे आते मानव दल में !!!
उनके हाथ कुल्हाड़ी, आरी,
उनकी नीयत थी शैतानी !
भटकी इधर-उधर बेचारी
सुन लो उसकी करूण कहानी !
कृतघ्न बन ना दो धोखा ,
निष्प्राण नही निःशब्द हूँ मैं
कहूँ कैसे अपने मन की व्यथा ?
जड़ नही चेतन हूँ मैं
दुखता है मन मेरा भी !!
गुरुवार, 21 अप्रैल 2022
3369...जब हों आमने सामने, आँखे हमारी नीची न हों...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।
आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर
ले चलें-
अचानक बादल आपस में टकराए
बिजली चमकी बादल गरजे
तेज हवा का झोंका आया
टप टप ओले टपके
बच्चे उन्हें खाने को दौड़े |
पर रहे ख्याल इतना,
जब हों आमने सामने,
आँखे हमारी नीची न हों ।।
घड़ी बिरहा की फिर टली है
क्या !!!!!
ऊंचा उड़ने से पहले देख तो ले
तेरे कदमों तले ज़मीं है क्या .......
दावा उनका फ़कीर होने का
दिल में हसरत कोई दबी है क्या......
उठाओं जिम्मेदारी का
चादर
जो गिरा
विकास पर बनकर
कफन
धरा की आत्मा से
उर्जा का रस निकालो
उडेल दो आसमान पे
बुधवार, 20 अप्रैल 2022
3369.…दुख के भीतर ही छुपा, सुख
।।प्रातः वंदन ।।
"अंधेरे में किरण बन
पथ दिखाने कौन आया है?
तिमिर को भेद कर अब
जगमगाने कौन आया है?
बहुत लम्बी निशा बीती,
अंधेरी कालिमा वाली,
बहुत ही दूर लगती थी,
उषा वह लालिमा वाली,
मगर अब प्राची को अरुणिम
बनाने कौन आया है?"
उर्मिल सत्यभूषण
नज़र लग गयीं आजकल के मौसम और मिजाज़ को,इसलिए थोड़े संयम और समझदारी की जरूरत है। लीजिये स्वागत है बुधवारिय प्रस्तुति की...✍️
ये कैसी आवाजें है?
देखा नही
पर सुना है
किताबों में पढ़ा है
पहले शास्त्रार्थ हुआ करते थे
जीवन जीने के लिए
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नया अफसाना
मंगलवार, 19 अप्रैल 2022
3368 ....एक से अधिक नदियाँ हैं जो समुद्र तक नहीं पहुंच पाती।
सोमवार, 18 अप्रैल 2022
3367...श्रद्धा भूल बैठे हैं हम, सुमन ही याद रह पायी...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय सुबोध सिन्हा जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।
आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-
देते रहना ही पाना है
ख़ाली दामन ही भरता है,
धरती अंबर मिल लुटा रहे
‘वह’ परिग्रही पर हँसता है!
एक लोकभाषा कविता-खेतवा में गाँव कै परानं
आपस में भी प्रेम नहीं
मेल-जोल गायब
केहू बा कलेक्टर
त केहू भयल नायब
ना कउनो नौटंकी,कुश्ती
नहीं रामलीला
कूकर चढ़ल चूल्हवा प
गुम भयल पतीला
बूढ़वन क घटल
बहुत मान मोरे भइया।
चौपाई - जो समझ आयी .. बस यूँ ही...
आराध्यों को अपने-अपने यूँ तो श्रद्धा सुमन,
करने के लिए अर्पण ज्ञानियों ने थी बतलायी।
श्रद्धा भूल बैठे हैं हम, सुमन ही याद रह पायी,
सदियों से सुमनों की तभी तो है शामत आयी .. शायद...
रीता मन - रीते नयन, भीगे-भीगे पल क्या लिखूँ?
सूना आँगन- सूना उपवन, उल्लास प्रेम का क्या लिखूँ?
वे सावन संग भीगे थे हम, रुत वसंत झूमे थे संग,
मकरंद प्रेम का बिखरा था, बूँदों में तन- मन पिघला था,
तुम संग सब मौसम बीते, पतझड़ का सूनापन क्या लिखूँ ?
जब प्रेम झडने लगता है कवि की कलम से
उठाईगीरे ने भक्तिभाव से परिपूर्ण स्वर में बाबा पापाचार्य से पूछा –
‘भगवन ! छहों दिशाएँ मुझे क्या संकेत कर रही हैं?’
बाबा पापाचार्य ने उत्तर दिया –
‘छहों दिशाएँ चीख-चीख कर कह रही हैं कि तू वह हीरो का हार हमारे चरणों में अर्पित कर दे.
उठाईगीरे ने वह हीरों का हार बाबा जी के चरणों में चढाते हुए उन से पूछा –
‘प्रभो ! आशीर्वाद के रूप में मुझे क्या मिलेगा?’
‘चोर बाज़ार में ये हार हम बिकवाएँगे. कई जौहरियों से हमारे कॉन्टेक्ट्स हैं.
चौथाई माल दरोगा रिश्वत सिंह और उसके साथी पुलिसिये रक्खेंगे
और बाक़ी बचा चौथाई माल तुझको मिल जाएगा.’



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