निवेदन।


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मंगलवार, 24 जुलाई 2018

1103...कहानी की भी होती है किस्मत, ऐसा भी देखा जाता है

सर्वप्रथम बधाइयाँ दें भाई कुलदीप जी को
उन्होंने नया नेटवर्क ले लिया है....
अब वे 
"जियो" के साथ जिएँगे...
वे नया सेटअप करवाने में व्यस्त हैं
अगले सप्ताह से वे निर्बाध रूप से आया करेंगे
आज फिर हमारी पसंद को सहन कर लीजिए.....

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प्रातः काल उषा की लाली 
शरमाई दुल्हन जैसी 
नीला अम्बर ओढ़ के निकली 
ज्यू पी घर प्रथम कदम रखती !

ऋषि कश्यप पुत्र संग ब्याही 
हुई सिन्दूरी मुस्काई 
शबनम के मोती बिखेरती 
पावन धरा उतर आई !

नफरतों की डालियाँ काटा करो
घी सभी बातों पे ना डाला करो 

गोपियों सा बन सको तो बोलना
कृष्ण मेरे प्यार को राधा करो

तुम भी इसकी गिर्द में आ जाओगे
यूँ अंधेरों को नहीं पाला करो


 "तुमको कितनी बार बोला है कि बार-बार किसी न किसी रिश्तेदार के यहाँ मत चली जाया करो, यार एक मिनट तुम्हारे बिना काटना मुश्किल होता मुझे......" राधिका को अचानक से जैसे अपनी भाभी की किस्मत से जलन होने लगी उसे कोई "समझदार" पति नहीं मिला...



घरौंदा बसा   
एक-एक तिनका   
मुश्किल जुड़ा,   
हर रिश्ता विफल   
ये मन असफल।   
-*-*-
क्यों नहीं बनी   
किस्मत की लकीरें   
मन है रोता,   
पग-पग पे काँटे   
आजीवन चुभते। 



मस्ती में जब रहती हो
तेरी पायल गीत सुनाती है
जब उदास तुम होती हो
तेरी पायल मुझे बुलाती है।


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आंसू गिरे
कभी खुशी के
कभी गम के
बस इतना सा
है फसाना

चलते-चलते एक कतरन जो उलूक टाईम्स की है
पते की बात है उसमें...

पर हर कहानी 
एक जगह नहीं 
बना पाती है 

कुछ छपती हैं 
कुछ पढ़ी जाती हैं 
अपनी अपनी 
किस्मत होती है 
हर कहानी की 

उस किस्मत के 
हिसाब से ही 
एक लेखक और 
एक लेखनी 
पा जाती हैं 

एक बुरी कहानी 
को एक अच्छी 
लेखनी ही 
मशहूर बनाती है 

-*-*-*-

हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का उन्तीसवाँ क़दम 
इस सप्ताह का विषय है
'किस्मत'
...उदाहरण...
मानना होगा इसे और
करना होगा संतोष
क्योंकि - वक्त से पहले और
किस्मत से ज्यादा नहीं मिलता
किसी को भी, कभी भी कुछ।

किस्मत भी बनाना पड़ता है -
सदैव कर्मरत रहकर।
कर्मों का यही हिसाब देता है
हमको वह फल, जो आता है
इस लोक और परलोक में
दोनों ही जगह काम।
-देवेन्द्र सोनी

उपरोक्त विषय पर आप सबको अपने ढंग से 
कविता लिखना है.....

आप अपनी रचना शनिवार 28 जुलाई 2018  
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक 30 जुलाई 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें
-*-*-
आज्ञा दें यशोदा को ..


सोमवार, 23 जुलाई 2018

1102..हम-क़दम का अट्ठाईसवाँ कद़म...हिंडोला


हिंडोला यानि झूला
सबने जीवन में कभी न कभी झूला का आनंद तो अवश्य लिया होगा। झूला जीवन में उल्लास और उमंग का प्रतीक है। सावन के महीने में धरती की सुषमा द्विगुणित हो जाती है। चारों ओर बिखरी हरियाली हृदय को आहृ्लादित करती है और तन मन प्रफुल्लित हो उठता है, इस अवसर को जीवंत करने के लिए खुशी से झूमकर गीत गाकर और झूला झूलकर प्रकृति की हरीतिमा के उत्सव में भाग लिया जाता है।
देश के लगभग हर प्रांत में सावन और झूले को लेकर 
लोकगीत प्रचलित है।
हिंडोला संस्कृति और परंपरा तो है ही यह स्वास्थ्य के लिए भी बहुत अच्छा है। हरे-भरे पेड़ो के मध्य डाला गया झूला मानसिक तनाव को दूर करता है।   झूला झूलने से हमारे शरीर में स्थित निष्क्रिय सुस्त कोशिकाओं में ऑक्सीजन पहुँचकर ताजगी का अनुभव कराती है। हिंडोला के पींग या झोटे भरने से पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती है।
अब तो शहरीकरण की संस्कृति में पेड़ ही लुप्त हो रहे हैं , व्यस्त जीवन की दिनचर्या में आने वाले दिनों में हिंडोले की यह परंपरा कितनी जीवित रहेगी यह भी एक प्रश्न है।
हिंडोला के इस गुणगान को विस्तृत रुप देती कुसुम जी के इस लेख को पढ़कर लोक संस्कृति की पावन सरिता में आप भी गोता लगाइये।



हिण्डोला एक परम्परा एक अनुराग!!


हिण्डोला याने झूला प्रायः सभी सभ्यताओं मे इस का वर्णन मिलता है राजस्थान मे कई प्रांतो मे इसे हिंडा या हिण्डोला बोलते हैं , और सावन के आते ही घर घर झूले पड़ जाते हैं, मजबूत और बड़े पेड़ों पर मोटी  सीधी साखा देख कर मोटे मजबूत जेवड़े ( जूट की रस्सी या रस्सा) से पुट्ठा बांध कर छोटे बडे हिण्डे तैयार करते है मोटियार (मर्द) लोग।

झूलती है औरतें और बच्चे सावन की तीज से भादो की तीज तक झूले की बहार  रहती है विवाहिताओं को तीज के संधारे के लिये पीहर बुलाया जाता है जहां उन्हें पकवान, सातू (सीके चने की दाल के बेसन मे पीसी चीनी घी देकर ऊपर बदाम पिस्ता गिरी से सजी एक राजस्थानी मिठाई जो परम्परा से सिर्फ सावन भादों मे ही बनाई जाती है) नये कपड़े और उपहार देकर विदा करते है शादी के बाद का पहला सावन बहुत हरख कोड से मनाया जाता है, हवेलीयों की पोलो (प्रोल ) बड़े विशाल प्रवेश द्वारों पर बडे छोटे झूले पड़ जाते हैं, सभी सखियाँ भाभीयां बहने साथ मिल खूब हंसी खुशी ये त्योहार मनाते हैं होड़ लगती है कौन कितना ऊपर झूला बढा पाता है, कोई भाईयों से मनुहार करती है वीरा सा हिंडा जोर से दो भाभियां चिहूकती है हां इतरा जोर से दो कि लाड़न को सीधा सासरा दिख जाय हंसी की फूलझड़ियां छूटती है छोटी उम्र की ब्याहताऐं अब ससुराल से बुलावे का संदेशे की बाट जोहती  है कभी बादल कभी हवा कभी सुवटे के द्वारा संदेशा भिजवाती है पीया जी आओ मोहे लेई जावो और 
फिर विदाईयां होती है सावन के बाद, गोरी धन चली ससुराल , 
गीतों मे कहती है सुवटडी...



अगले बरस  बाबोसा,वीरासा ने भेज बुलासो जी,

         सावन की जद आवेला तीज जी।

और अब चलते है हम हमारे आज के विषय हिंडोला पर लिखी गयी 
हमारे परमप्रिय रचनाकारोंं की विशेष कृतियों का आस्वादन लेते है-


आदरणीया नीतू ठाकुर जी की रचना

एक तरफ बाबुल की गलियाँ 
एक तरफ संसार पिया का 
किसको थामूं किसको छोडूं 
दोनों हैं आधार जिया का 

आगे कुँवा तो पीछे खाई 
जगने कैसी रीत बनाई 
किस्मत ने क्या खेल है खेला 
मनवा डोले जैसे हिंडोला
◆★◆★◆

आदरणीया उर्मिला जी की दो रचना
तन की तृष्णा तनिक है!
मन की तृष्णा है अनन्त !!
धन दौलत धरी रह जाये,
बुलावा जब पी का आये!!
हिंडोला झूल रही राधा प्यारी 
झुलावे कृष्ण मुरारी ना......
छाई काली घटा मतवारी
झुलावें कृष्ण मुरारी ना...

पी..पी..पपिहा सुर में गावे
कोयल प्यारी कुक सुनावे
मादक स्वर बंसी के बाजे
सुध बुध खोवें राधा रानी ना....
झुलावें कृष्ण मुरारी ना.....
◆★◆★◆★◆

आदरणीया कुसुम कोठारी जी की दो रचना

गढ़ प्रोल्या मे सज्यो हिण्डोलो


छोटी छोटी बूंद बरसे बदरिया
बाबुल मोहे हिण्डन की मन आई
कदम्ब डारी डारो हिण्डोला
लम्बी डोर लकड़िन का पुठ्ठा
भारी सजा लाडन का हिण्डोला
आई सखियाँ ,भाभी ,बहना,
वीराजी हिण्डावे दई दई झोटा


ओढ के धानी चुनर प्रीत की
संग सांवलिया के झुलन जाऊँ
पेंग बढ़ाऊं ,
पायल बोले रुनझुन रुनझुन
मन के संदल महके
पपीहरा गीत सुनाऐ

◆★◆★◆★◆
आदरणीया साधना वैद जी

सूना री हिंडोला अम्बुआ की डार पे जी
ए जी कोई मैया ना, अम्बे कोई बाबुल ना
देने को पुकार !
छूट गया बहना
देखो मेरा मायका जी !
◆★◆★◆★◆
आदरणीया आशा सक्सेना जी

चलो  री सखी चलें अमराई में
झूलन के दिन आए
नीम की डाली पे झुला डलाया
लकड़ी की पाटी  मंगवाई
रस्सी मगवाई बीकानेर से
भाबी जी आना भतीजी को भी लाना
काम का  समय निकाल कर पर आजाना

◆★◆★◆★◆
आदरणीया अभिलाषा चौहान जी


बैठ सखी मैं पवन हिंडोला
पिय से मिलने जाऊंगी

कहां बसे है पिय मोरे प्यारे
अब कैसे पता लगाऊंगी

लोग कहत हैं प्रियतम मेरे
घट घट में हैं वास करें

◆★◆★◆
आदरणीया अनुराधा चौहान जी की दो रचना

घिर आई काली घटा मतवाली
झूले पड़ गए कदम की डाली
राधा संग झूलें झूलना श्री कृष्ण मुरारी
कूक रही कोयलिया काली
नाचे मोर नाचे पपीहा
नाच रहीं गोप कुमारीl
★■★
सखी डाला रे हिण्डोला यादों का
पहले झूली मैया की यादें
बड़े प्यार से हिंडोला झुलाएं
आंखों से ममता रस बरसे
आंखें मेरी भर भर आएं
सखी ..........................

◆★◆★◆★◆
और चलते-चलते आदरणीया सुप्रिया रानू जी की बेहद सुंदर रचना
बचपन के सखियन के साथे
बाग बगीचे में झुमल गावल,
सावन के महीने में 
हिंडोला पे झुलल,
और बदरा के साथ भींजल
सब बिसर गइल अब मायके में ही,
अब त जीवन हिंडोला हो गइल....

-*-*-*-*-
और अब 
 फिल्म बन्दिनी का गीत
सुनिए आप भी....

अगले विषय के लिए कल का अँक अवश्य देखें
श्वेता ...




रविवार, 22 जुलाई 2018

1101...कुत्ता होता मैं, धोबी का छोड़ कर किसी का भी होता....

डब्बल वन ज़ीरो वन
ग्यारहवें सैकड़े को पार कर
कर नए सैकड़े की ओर पहला क़दम..

..............................
मंत्र-तंत्र और कुतंत्र
बस इसी का ज़माना है आज के इस युग में
..................
एक साक्षात्कार के चक्करव्यूह में फंस गई
हमारी विभा दीदी....
एक प्रश्न और उसके उत्तर पर एक नज़र..
प्रश्न :- साहित्य राजनीति की #धजिया उड़ाने के लिए सक्षम होता है फिर साहित्य में भी राजनीति क्यों?

उत्तर:- जिस नीति से राज हो सके, फिर राज करना कौन नहीं चाहे... राजनीति के शिकार नीरज जी शिक्षक की नौकरी त्याग दिए… आज दुनिया भी...
-*-*-*-
अब बाकी की रचनाएँ इस ब्रेक के बाद....


मांग लेना मनचाहा..नूपुरम्
ठोकरों से संभलने का हौसला मांगना ।
कड़वे अनुभवों से संवेदना मांगना ।
फूलों से पराग मांगना ।
जुगनुओं से रोशनी मांगना ।
भवितव्य से चुनौती मांगना ।
भाग्य से कर्मठता का ईनाम मांगना ।
ठाकुरजी से सद्बुद्धि और भक्ति मांगना ।

मैं भी उड़ती....सुप्रिया पाण्डेय
तुम बन पाते जो मेरा आसमान 
तो मैं भी उड़ती,
तुम बन पाते जो चट्टान तो 
उड़ती हवा बनके भी
तुम्हारे पास ठहरती,
तुम बन पाते जो समंदर 
बनके नदी तुम्हारी बाँहो में बिखरती

स्वाद!.....अपर्णा वाजपेई

गुमनाम इश्क़ की रवायत में,
जल रही हैं उंगलियां,
जल गया है कुछ चूल्हे की आग में,
आज खाने का स्वाद लज़ीज़ है।

मातृभूमि !....गगन शर्मा
मातृभूमि ! ज्यादातर या सरल भाषा में कहा जाए तो जो इंसान 
जहां जन्म लेता है, वही उसकी मातृभूमि कहलाती है। पर 
आज दुनिया सिमट सी गयी है। रोजी-रोटी, काम-धंधे या बेहतर 
भविष्य की चाहत में लोग विदेश आने-जाने लगे हैं। तो ऐसे लोगों की संतान का जन्म यदि दूसरे देश में होता है तो उसकी मातृभूमि 
कौन सी कहलाएगी ? उसकी वफादारी किस देश के साथ होगी ? 
जहां उसने जन्म लिया है या फिर उस देश के प्रति जिसको 
उसने देखा ही नहीं है.......!

चलते चलते मेरी ये बात याद रखना.....व्याकुल पथिक

अब जब इस जिंदगी के सफर की पहेलियों से उभर कर अपनी इस कठिन जीवन यात्रा को विश्राम देने के प्रयास में जुटा हूं, तो स्मृतियों की घेराबंदी कुछ बढ़ती जा रही है। मन में सवाल उठ रहा है कि किन्हें खोया और क्या पा लिया।  साथ ही एक कोशिश अभी और भी शेष है कि कर्म पथ से मुक्ति पथ की ओर बढ़ते हुये, वह है-

रोते रोते ज़माने में आये मगर
हँसते हँसते ज़माने से जायेँगे हम
-*-*-*-*-
एक पुरानी कतरन मिल गई उलूक टाईम्स की
बातों को खरा लिखा है....आदरणीय डॉ. सुशील जी ने


बताया...
कुत्ता हिन्दू
नहीं होता है
कुत्ता मुस्लिम
नहीं होता है
कुत्ता क्षत्रिय
नहीं होता है
कुत्ता ब्राह्मिन
नहीं होता है
और तो और
कुत्ते का
रिजर्वेशन
नहीं होता है 
काश !
कुत्ता होता मैं

-*-*-*-*-
आज्ञा दें
दिग्विजय







शनिवार, 21 जुलाई 2018

1100... मुसाफिर



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मुझे सोने से पहले मीलों दूर जाना है।
1-11-111 पार करते  हम आ पहुँचे हैं

वाँ अंक पर

मेरे पास से गुज़र कर मेरा हाल तक न पूछा
मैं यह कैसे मान जाऊँ के वो दूर जा के रोया
निकले थे इस आस पे , किसी को बना लेंगे अपना
एक ख़्वाइश ने उम्र भर का बना दिया

मुसाफिर

शज़र को सींचते हैं  खून पसीने से मगर
कुछ फल के लिए ,क्यों झगड़ जाते हैं मुसाफिर !!

सुना है दरख़्त पतझर में  वीरान होता है
मगर अब पल भर में ,बिछड़ जाते हैं मुसाफिर !!

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मुसाफिर

जब गुजरूँगा उस रास्ते से तो क्या मैं पहचान पाऊँगा उस रास्ते को।
आज मिल रही है हर रास्ते पर ठोकरे, है नहीं दूर दूर तक कोई संभालने वाला।

समझ में नहीं आ रहा कैसे संभालू अपने इन लड़खड़ाते हुए कदमो को।

कभी कभी अपने दिल को तसल्ली देने के लिए सोचता हूँ।
कैसा होगा वो एहसास जब मंजिल मिलेगी मुझे।

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बटोही

यह बुरा है या कि अच्छा व्यर्थ दिन इस पर बिताना
अब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना

तू इसे अच्छा समझ यात्रा सरल इससे बनेगी
सोच मत केवल तुझे ही यह पड़ा मन में बिठाना



मुसाफिर

यूं तो मौसम कई ग़मगीन भी आये,
कई अश्क हमें पल – पल सताए !!

कुछ ने मुझको बाँधा, कुछ ने रोकना चाहा,
बंधिशो में अपनी, हमें तोड़ना भी चाहा !!

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मुसाफिर

‘हमारी असली यात्रा उस दिन शुरु होती है
जिस दिन हमारा दुनिया की हर चीज से,
हर रिश्ते से, भगवान पर से विश्वास उठ जाता है और
यात्रा उस दिन खत्म होती है जिस दिन ये सारे विश्वास लौटकर हमें गले लगा लेते हैं। ...
भटकना मंजिल की पहली आहट है। कोई सही से भटक ही ले
तो भी बहुत कुछ पा जाता है। सच्ची आजादी का कुल मतलब अपनी मर्जी से भटकना है।’

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अब बारी है हम-क़दम हेतु विषय की
अट्ठाइसवाँ अँक...
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम अट्ठाईसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
'हिंडोला'
...उदाहरण...
हिंडोला कुँज वन डालो झूलन आईं राधिका प्यारी
कहे के खंभ लगवाए कहे की लगी डोरियाँ प्यारी
सोने के खंभ लगवाए रेशम लगी डोरियाँ प्यार
हिंडोला...
कहाँ से आये श्याम बनवारी कहाँ से आई राधिका प्यारी
गोकुल से आये बनवारी मथुरा आइ राधिका प्यारी
हिंडोला...
कि झोंका धीरे से दे ओ हमें डर लगता भारी
डरो मत राधिका प्यारी हमें तो तुम जान से प्यारी
हिंडोला...

उपरोक्त विषय पर आप सबको अपने ढंग से 
लोकगीत बनाइये

आप अपनी रचना आज शनिवार 21 जुलाई 2018  
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं।
चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक
23 जुलाई 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें

फिर मिलेंगे.....
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शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

1099....सच है दुनिया वालों कि हम है अनाड़ी

सादर नमस्कार
महाकवि डॉ. गोपालदास नीरज को भावभीनी विनम्र श्रद्धांजलि।

4 जनवरी 1925 को उदित साहित्य का जाज्वल्यमान सितारा 19 जुलाई 2018 को हमेशा के लिए धरती को छोड़कर आसमान में अनोखी चमक बिखेरता हुआ स्थिर हो गया।
महाकवि गोपालदास नीरज का जन्म उत्तरप्रदेश के इटावा में हुआ था। पद्म श्री और पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित बेहद प्रभावशाली कवि का सफ़र टाईपिस्ट से शुरु होकर हिंदी के प्रवक्ता और फिर  फिल्मों तक जा पहुँचा। देश विदेश में कवि-सम्मेलनों में इनकी दमदार और जीवंत उपस्थिति इनकी लोकप्रियता का प्रमाण रही।
गीत,ग़ज़ल, कविताएँ,हायकु एवं
 विधाओं में माहिर नीरज जी एक विशिष्ट शख़्सियत थे।

एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था-
"कवि आज हज़ारों हो गये है परंतु कविता को उन्होंने अलोकप्रिय कर दिया है।"

"हिंदुस्तान में आज जितने कवि है पहले कभी नहीं थे क्योंकि सब कविता लिखते है, लय-ताल युक्त गीत बहुत कम ही लोग लिख पाते हैं।"

"कविता तो वो है जो आपके हृदय को छुये,आपके संस्कार को छुये, सिर्फ बौद्धिक व्यायाम से कविता नहीं बनती।" 

इनका एक शेर जो मुशायरों में अक्सर सुना जाता है-

इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में,
लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में।
न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर,
ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में॥

उनकी लिखी एक कविता की चंद पंक्तियाँ-

आँसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा
जहाँ प्रेम का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा
मान-पत्र मैं नहीं लिख सका, राजभवन के सम्मानों का
मैं तो आशिक़ रहा जन्म से, सुंदरता के दीवानों का
लेकिन था मालूम नहीं ये, केवल इस ग़लती के कारण
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा

खिलने को तैयार नहीं थी, तुलसी भी जिनके आँगन में
मैंने भर-भर दिए सितारे, उनके मटमैले दामन में
पीड़ा के संग रास रचाया, आँख भरी तो झूम के गाया
जैसे मैं जी लिया किसी से, क्या इस तरह जिया जाएगा

आइए आज की रचनाएँ  पढ़ते है-
 ★
आदरणीय विश्वमोहन जी की कचरे में सपने बीनते बच्चों के लिए की गयी अद्भुत काव्यात्मक मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति

लेकर कर, कुत्तों के कौर,
दाने अन्न के बीनता है.
भाग्यहीन है, भरत वीर यह!
दांत, शेर की गिनता है
◆★◆

आदरणीया कुसुम जी की लेखनी से निसृत व्यंग्यात्मक  रचना

चले तो  सिक्का भी चल पड़ता खोटा
नही तो रूपये का भाग भी खोटा ।



चमचागिरी से पैसा बन जाता मोटा

ईमान के घर दाल रोटी का टोटा ।
◆★◆

आदरणीया मीना भारद्वाज जी की लिखी सुंदर
सेदोका
तुम्हारा मौन
आवरण की ओट
कहानी कहता है
एक लक्ष्य है
अर्जुन के तीर सा
चिड़िया के चक्षु सा
◆★◆

आदरणीया जैन्नी शबनम जी की पिता के लिखी गयी
भावपूर्ण अभिव्यक्ति

कुछ चिट्ठियाँ भी हैं  

जिनमें रिश्तों की लड़ी है  

जीवन-मृत्यु की छटपटाहट है  

संवेदनशीलता है  

रूदन है  

क्रंदन है  

जीवन का बंधन है  



आदरणीया पूर्णिमा जी की एक शानदार रचना


कोई अस्तित्व न हो शब्दों का, यदि हो न वहाँ मौन का लक्ष्य |कोई अर्थ न हो मौन का, यदि निश्चित न न हो वहाँ कोई ध्येय |मौन का लक्ष्य है प्रेम, मौन मौन का लक्ष्य है दयामौन का लक्ष्य है आनन्द, और मौन मौन का है

★◆★
और चलते-चलते आदरणीय शशि जी  बेबाक लेखनी से
उजागर किया गया पत्रकारिता का सच

अमन बेच देंगे,कफ़न बेच देंगे
जमीं बेच देंगे, गगन बेच देंगे
कलम के सिपाही अगर सो गये तो,
वतन के मसीहा,वतन बेच देंगे"
◆★◆
हम कल ग्यारह सौंवा मील का पत्थर छुएँगे...
इस अवसर पर आदरणीय राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर साहब 
की ग्यारहसौंवी प्रस्तुति की एक झलक....
रोज सबेरे आता सूरज - 1100वीं पोस्ट
रोज सबेरे आता सूरज, 
हमको रोज जगाता सूरज.

पर्वत के पीछे से आकर,

अँधियारा दूर भगाता सूरज.
◆★◆
सुनिये नीरज जी की आवाज़ में उनकी प्रसिद्ध कविता

आज के लिए इतना ही
हमक़दम के इस सप्ताह के विषय के लिए


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