हिंडोला यानि झूला
सबने जीवन में कभी न कभी झूला का आनंद तो अवश्य लिया होगा। झूला जीवन में उल्लास और उमंग का प्रतीक है। सावन के महीने में धरती की सुषमा द्विगुणित हो जाती है। चारों ओर बिखरी हरियाली हृदय को आहृ्लादित करती है और तन मन प्रफुल्लित हो उठता है, इस अवसर को जीवंत करने के लिए खुशी से झूमकर गीत गाकर और झूला झूलकर प्रकृति की हरीतिमा के उत्सव में भाग लिया जाता है।
देश के लगभग हर प्रांत में सावन और झूले को लेकर
लोकगीत प्रचलित है।
हिंडोला संस्कृति और परंपरा तो है ही यह स्वास्थ्य के लिए भी बहुत अच्छा है। हरे-भरे पेड़ो के मध्य डाला गया झूला मानसिक तनाव को दूर करता है। झूला झूलने से हमारे शरीर में स्थित निष्क्रिय सुस्त कोशिकाओं में ऑक्सीजन पहुँचकर ताजगी का अनुभव कराती है। हिंडोला के पींग या झोटे भरने से पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती है।
अब तो शहरीकरण की संस्कृति में पेड़ ही लुप्त हो रहे हैं , व्यस्त जीवन की दिनचर्या में आने वाले दिनों में हिंडोले की यह परंपरा कितनी जीवित रहेगी यह भी एक प्रश्न है।
हिंडोला के इस गुणगान को विस्तृत रुप देती कुसुम जी के इस लेख को पढ़कर लोक संस्कृति की पावन सरिता में आप भी गोता लगाइये।
हिण्डोला एक परम्परा एक अनुराग!!
हिण्डोला याने झूला प्रायः सभी सभ्यताओं मे इस का वर्णन मिलता है राजस्थान मे कई प्रांतो मे इसे हिंडा या हिण्डोला बोलते हैं , और सावन के आते ही घर घर झूले पड़ जाते हैं, मजबूत और बड़े पेड़ों पर मोटी सीधी साखा देख कर मोटे मजबूत जेवड़े ( जूट की रस्सी या रस्सा) से पुट्ठा बांध कर छोटे बडे हिण्डे तैयार करते है मोटियार (मर्द) लोग।
झूलती है औरतें और बच्चे सावन की तीज से भादो की तीज तक झूले की बहार रहती है विवाहिताओं को तीज के संधारे के लिये पीहर बुलाया जाता है जहां उन्हें पकवान, सातू (सीके चने की दाल के बेसन मे पीसी चीनी घी देकर ऊपर बदाम पिस्ता गिरी से सजी एक राजस्थानी मिठाई जो परम्परा से सिर्फ सावन भादों मे ही बनाई जाती है) नये कपड़े और उपहार देकर विदा करते है शादी के बाद का पहला सावन बहुत हरख कोड से मनाया जाता है, हवेलीयों की पोलो (प्रोल ) बड़े विशाल प्रवेश द्वारों पर बडे छोटे झूले पड़ जाते हैं, सभी सखियाँ भाभीयां बहने साथ मिल खूब हंसी खुशी ये त्योहार मनाते हैं होड़ लगती है कौन कितना ऊपर झूला बढा पाता है, कोई भाईयों से मनुहार करती है वीरा सा हिंडा जोर से दो भाभियां चिहूकती है हां इतरा जोर से दो कि लाड़न को सीधा सासरा दिख जाय हंसी की फूलझड़ियां छूटती है छोटी उम्र की ब्याहताऐं अब ससुराल से बुलावे का संदेशे की बाट जोहती है कभी बादल कभी हवा कभी सुवटे के द्वारा संदेशा भिजवाती है पीया जी आओ मोहे लेई जावो और
फिर विदाईयां होती है सावन के बाद, गोरी धन चली ससुराल ,
गीतों मे कहती है सुवटडी...
फिर विदाईयां होती है सावन के बाद, गोरी धन चली ससुराल ,
गीतों मे कहती है सुवटडी...
अगले बरस बाबोसा,वीरासा ने भेज बुलासो जी,
सावन की जद आवेला तीज जी।
और अब चलते है हम हमारे आज के विषय हिंडोला पर लिखी गयी
हमारे परमप्रिय रचनाकारोंं की विशेष कृतियों का आस्वादन लेते है-
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और अब
एक तरफ बाबुल की गलियाँ
एक तरफ संसार पिया का
किसको थामूं किसको छोडूं
दोनों हैं आधार जिया का
आगे कुँवा तो पीछे खाई
जगने कैसी रीत बनाई
किस्मत ने क्या खेल है खेला
मनवा डोले जैसे हिंडोला
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आदरणीया उर्मिला जी की दो रचना


तन की तृष्णा तनिक है!
मन की तृष्णा है अनन्त !!
धन दौलत धरी रह जाये,
बुलावा जब पी का आये!!
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हिंडोला झूल रही राधा प्यारी
झुलावे कृष्ण मुरारी ना......
छाई काली घटा मतवारी
झुलावें कृष्ण मुरारी ना...
पी..पी..पपिहा सुर में गावे
कोयल प्यारी कुक सुनावे
मादक स्वर बंसी के बाजे
सुध बुध खोवें राधा रानी ना....
झुलावें कृष्ण मुरारी ना.....
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छोटी छोटी बूंद बरसे बदरिया
बाबुल मोहे हिण्डन की मन आई
कदम्ब डारी डारो हिण्डोला
लम्बी डोर लकड़िन का पुठ्ठा
भारी सजा लाडन का हिण्डोला
आई सखियाँ ,भाभी ,बहना,
वीराजी हिण्डावे दई दई झोटा
झूलन चित्त चढ़ी मोरे
ओढ के धानी चुनर प्रीत की
संग सांवलिया के झुलन जाऊँ
पेंग बढ़ाऊं ,
पायल बोले रुनझुन रुनझुन
मन के संदल महके
पपीहरा गीत सुनाऐ
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आदरणीया साधना वैद जी
ए जी कोई मैया ना, अम्बे कोई बाबुल ना
देने को पुकार !
छूट गया बहना
देखो मेरा मायका जी !
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चलो री सखी चलें अमराई में
झूलन के दिन आए
नीम की डाली पे झुला डलाया
लकड़ी की पाटी मंगवाई
रस्सी मगवाई बीकानेर से
भाबी जी आना भतीजी को भी लाना
काम का समय निकाल कर पर आजाना
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पिय से मिलने जाऊंगी
कहां बसे है पिय मोरे प्यारे
अब कैसे पता लगाऊंगी
लोग कहत हैं प्रियतम मेरे
घट घट में हैं वास करें
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झूले पड़ गए कदम की डाली
राधा संग झूलें झूलना श्री कृष्ण मुरारी
कूक रही कोयलिया काली
नाचे मोर नाचे पपीहा
नाच रहीं गोप कुमारीl
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सखी डाला रे हिण्डोला यादों का
पहले झूली मैया की यादें
बड़े प्यार से हिंडोला झुलाएं
आंखों से ममता रस बरसे
आंखें मेरी भर भर आएं
सखी ..........................
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और चलते-चलते आदरणीया सुप्रिया रानू जी की बेहद सुंदर रचना
बचपन के सखियन के साथे
बाग बगीचे में झुमल गावल,
सावन के महीने में
हिंडोला पे झुलल,
और बदरा के साथ भींजल
सब बिसर गइल अब मायके में ही,
अब त जीवन हिंडोला हो गइल....
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फिल्म बन्दिनी का गीत
सुनिए आप भी....
सुनिए आप भी....











