निवेदन।


फ़ॉलोअर

शनिवार, 21 मई 2016

309 ..... कल का क्या





सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष







है क्या इसमें हकीकत ये तो केवल ख्वाब था,
पर इस कल्पना ने ही खयाल सारे धो दिये।
ख्वाब थे पाले मैंने भी क्या, खूब नाम कमाउंगा,
इस शब्दलोक की भूमि पर, धन-धान्य जुटाउंगा




 धारा 415= छल करना धारा 
445= गृहभेदंन धारा 
494= पति/पत्नी के जीवनकाल में पुनःविवाह0 
धारा 499= मानहानि 
धारा 511= आजीवन कारावास से दंडनीय अपराधों को करने के प्रयत्न के लिए दंड।




सोचा ...चलो अब साइंस से पीछा छुटा 
आराम से अब साहित्य का मज़ा जाए लूटा।

पर बाबा को मुझे इंजीनियर बनाना था
अच्छा वर पाने के लिए डिग्री जो लाना था।





दो दिन तेज़ बारिश हो जाये 
तो छतें इतना टपकती हैं 
की outdoor और indoor का 
फर्क खत्म हो जाता है.… 

और भी है बहुत कुछ कहने को 
पर बातों की फहरिस्त
कहाँ खत्म होने वाली


कल का क्या


दौड़ता रहा... भागता रहा
हुयी रात तो सबेरा भी हुआ
मगर न आया
तो वो सुनहरा कल ...
समय बदला, दिन बदला
जगह बदली, लोग बदले
यहाँ तक कि हम भी बदले
लेकिन न मिला तो केवल वो कल



नास्तिकता खूबसुरत है


एक अन्य आश्चर्य की बात है कि जहाँ सभी धर्म मनुष्य को ईश्वर का रूप
 या फिर उसके द्वारा उत्पन्न मानते हैं, वहीं किसी भी धर्म में मनुष्यों की समानता को
पूर्ण रूप में धरातल पर नहीं उतरा गया और प्रत्येक धर्म में विशेषाधिकार युक्त
एक वर्ग मौजूद रहा जो व्यक्ति और ईश्वर के बीच के बिचौलिए का काम करता है.
शायद ही किसी धर्म में सभी मनुष्यों को सामान अधिकार होने की बात कही गयी हो.
 इसके विपरीत नास्तिकतावाद चूंकि ईश्वर को ही  नहीं मानता है,
इसमें ऐसे किसी बिचौलिए के होने की संभावना ही नहीं है.



कब तक ठुकराओगे



नारी के बिना नारायण कैसे कहला पाओगे
कितने जन्मों तक सोने की सीता बनवाओगे
बिन नारी जीवन, घर सूना, कैसे जगत चलाओगे। है राम

पत्थर को नारी  करने वाले पत्थर बन बैठे
नैन मूँद कर ले लिए भगवन मर्यादा के ठेके
अपने ही अंतर्मन को आखिर





फिर मिलेंगे ........ तब तक के लिए

आखरी सलाम


विभा रानी श्रीवास्तव



शुक्रवार, 20 मई 2016

308....आजकल घर में पुराना सामान कौन रखता है..??


जय मां हाटेशवरी...

आज मेरे एक  मित्र ने...
whatsapp पर ये  गजल भेजी...
भाव मन को छु गये...
पत्थरों के शहर में कच्चे मकान कौन रखता है..
आजकल चिड़ियों का भी ध्यान कौन रखता है..?
अपने घर की कलह से फुरसत मिले तो सुनें..
आजकल पराई दीवार पर कान कौन रखता है..?
हर चीज मुहैया है मेरे शहर में किश्तों पर..
आजकल लगाम में अरमान कौन रखता है..?
फ़ुर्सतें हों, यारियाँ हों, गुफ्तगू हो, कुछ सुकूँ हो..
आजकल ज़िंदगी यूं आसान कौन रखता है..??
मोहब्बत में मोल है, शराफत में तोल है..
आजकल इश्क पर जान कौन रखता है..??
मासूमियत में मुस्कुरा दें, खिलखिला के हंस पड़ें..
आजकल बच्चे यूँ नादान कौन रखता है..??
बहलाकर ले जाते हैं वृद्धाश्रम में मां बाप को..
आजकल घर में पुराना सामान कौन रखता है..??
अब पेश है...आज की कुछ चुनी हुई रचनाएं...

 राजशाही से लोकतंत्र तक लोकतांत्रिक कुत्ते और उसकी कटी पूँछ की दास्तान
s400/tail-wag_1_
‘उलूक’
तेरी बैचैनी
भी समझ के
बाहर होती है
जो नहीं होता है
उसके लिये ही तू
किसलिये हमेशा
इतना जार
जार रोता है
अब तक भी
समझता क्यों नहीं है
प्रजातंत्र हो चुका है
सारे प्रजा के तांत्रिक
प्रजा के लिये ही
तंत्र करते हैं

ध्यान के जरिये मिटाएं अकेलापन
यदि आप ध्यान (Maditation) के लिए तैयार है, तो आप इसका अभ्यास और बढ़ाइए। ध्यान रूपी अवसर से आप स्वयं से जुड़ जाते हैँ। ऐसा माना जाता है कि उदासी मिटाने का
इससे अच्छा तरीका नहीँ है।

क्या सदैव सत्य बोला जा सकता है?
ब्रह्म ही परम सत्य है जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता. अपनी आत्मा को उस परम आत्मा से आत्मसात करके और उसमें स्वयं को समाहित करके ही उस निर्पेक्ष
परम सत्य का अनुभव कर सकते हैं. लेकिन इस सत्य का दर्शन और पालन एक साधारण व्यक्ति के लिए संभव नहीं है. महात्मा गाँधी ने कहा था “सत्य की खोज के साधन जितने
कठिन हैं, उतने ही आसान भी हैं। अहंकारी व्यक्ति को वे काफी कठिन लग सकते हैं और अबोध शिशु को पर्याप्त सरल।“
हमें बचपन से सिखाया जाता है "सत्यम् ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यम् अप्रियं", लेकिन सत्य अधिकांशतः कड़वा होता है और अगर उसे प्रिय बनाना पड़े तो
फिर वह सत्य कहाँ रहेगा, अधिक से अधिक उसे चासनी में पगा अर्ध सत्य कह सकते हैं. अगर सत्य अप्रिय है तो उसे न कहना क्या सत्य का गला घोटना नहीं है? अप्रिय सत्य
कहने के स्थान पर अगर मौन का दामन थाम लिया जाय तो क्या यह असत्य का साथ देना नहीं होगा? ऐसे हालात में क्या किया जाए? आज के समय जब चारों ओर स्वार्थ और असत्य
का राज्य है, कैसे एक व्यक्ति केवल सत्य के सहारे जीवन में आगे बढ़ सकता है? लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कुछ पल की खुशी के लिए असत्य को अपना लिया जाये.

सुख-दुःख का अधिष्ठाता 'मन
Image result for soul
किसी वस्तु का मूल्य एवं महत्व 
तब समझ मेँ आता है जब वह हाथ से निकल जाती है। धन की स्थिति मेँ धनवान को उसके महत्व का ध्यान नहीँ आता। वह उसे अपने लिए बड़ी ही साधारण और सामान्य वस्तु समझता
है और बिना किसी विचार के उसका उपयोग-दुरूपयोग करता है। किँतु जब वह उससे हाथ धो बैठता है, तब उसके महत्व को बार-बार याद करके रोता, कलपता और पछताता है। किसी
व्यक्ति को स्वास्थय के महत्व का भान तब तक नहीँ होता जब तक वह उसे खो नहीँ देता। यह कोई बुद्धिमानी की बात नहीँ है कि मनुष्य किसी वस्तु का महत्व तब तक समझना
ही न चाहे जब तक वह उसे सुलभ है। किसी वस्तु को खोकर उसके महत्व को समझने वाले अज्ञानियोँ के अधिकार मेँ पश्चाताप के सिवाय और कुछ नहीँ रह जाता।

एहसास के क्षण
s1600/nepal%2Bearthquake
कैसा यह कहर,
तबाही का मंजर।
यह नीरवता,
मरघट सी उदासी
पढ़ रही मर्सिया
भोर के उजास के सपने देखती
हर ज़िन्दगी की
मौत पर।
विधाता दे दे मुझे
एहसास के कुछ क्षण

आप आये तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
s200/suhani%2Bchndani
आज वो बात नहीं फिर भी कोई बात तो है
मेरे हिस्से में ये हल्की से मुलाकात तो है
गैर का हो के भी ये हुस्न मेरे साथ तो है
हाय किस वक़्त मुझे कब का गिला याद आया

तो फिर मरता कौन है?
आत्मा का देहांतरण होता है। तो फिर मरता कौन है ?शरीर तो जड़ है ,पाँच तत्वों का जमावड़ा है।क्रिया करनी पड़ती है ,शरीर की आत्मा के निकल जाने के बाद। आँख ,नाक
कान, मुख ,चमड़ी  सब अभी भी रहते हैं लेकिन न आँख अब देखती है न कान सुनते हैं न मुख अब  बोलता है न चमड़ी स्पर्श का अनुभव करती है।
कौन है वह जो आँख की भी आँख है ,कान का भी कान है (श्रवण है ),मुख का सम्भाषण है ,चमड़ी का स्पर्श अनुभव करता है। नासिका की गंध है ?कहाँ गया वह। उपनिषद का ऋषि
कहता है यह शरीर एक वृक्ष के समान है जिस पर दो पक्षी रहते हैं। एक जो वृक्ष के फल खाता है ,सुख दुःख का भोक्ता है और दूसरा सिर्फ साक्षी भाव से उसको ऐसा करते
हुए देखता है। वह पक्षी जो सुख दुःख का अनुभव करता है बद्धजीव है ,दूसरा परमात्मा है।


आज के लिये....
यहीं तक...
धन्यवाद।








गुरुवार, 19 मई 2016

307.....खुदा वाली चिठ्ठी..!!

सादर अभिनन्दन
आज फिर मैं यशोदा....
सुबह-सुबह उठ जाती हूँ
पढ़ने बैठ जाती हूँ
जो मन में भाया
उस पन्नें में
एक चिप्पी लगा देती हूँ
वही चिप्पियों वाले पन्ने
आपके सामने रख रही हूँ....


बोतल में बंद हवा
हवा पर हवा का 'अधिकार' नहीं रहा। हवा अब इंसान के 'नियंत्रण' में आ गई है। इंसान ने हवा की 'आत्मा' को बोतल में कैद कर बेचना शुरू कर दिया है। जी हां, अब हवा भी बाजार में बिकने को तैयार है। जिस प्रकार सील्ड बोतल में पानी भरकर बेचा जाता है। ठीक उसी तरह अब हवा को भी बोतल में बंदकर बेचा जाएगा।


जब मैं तुम्हारी घुप्प चुप्पी से
परिशां होकर चुप हो जाता हूँ
तब मेरी चुप्पी चुपचाप आकर
मुझे यूँ चुपचाप रहने से रोक
ये समझा कर सिहर जाती है

ईश्वर के द्वारा रचे गए इस संसार में सबसे अद्भुत प्राणी सिर्फ मनुष्य ही है. मनुष्य को ही ईश्वर ने ज्ञान और बुध्दि से नवाज़ा है ,ताकि वो अन्य सभी प्राणियों में श्रेष्ठ रहे . मनुष्य जैसे जैसे बढता गया वैसे वैसे उसके जीवन में आमूल परिवर्तन आये है . और इन्ही परिवर्तनों ने उसके जीवन को और बेहतर बनाया और इस बेहतरी ने उसे अपने जीवन में अचार ,विचार, व्यवहार और संस्कारों से भरने का अवसर भी दिया . इन्ही सब बातो की वजह से उसने अपने जीवन में शिष्टाचार को भी स्थान दिया 

जब कभी बारिश होती है
जब कभी रुपहले बादल नीचे उतरते हैं 
जब कभी चाँदनी धरती पर उतरती है 
उस उम्रदराज़ औरत के भीतर से 
एक छुईमुई लड़की निकलती है 

आज की अभी-अभी पढ़ी रचना....
खुदा वाली चिठ्ठी..!!
आज सुबह मैंने आँखें खोली तो मेरे सिहराने एक चिठ्ठी रखी हुई थी, मैंने अधखुली आँखों से उसे पढ़ा और पढ़ने के बाद बेशक पूरी नींद खुल गई हैं जो कुछ यूँ थी- प्यारी बिटिया तुम्हें भला कुछ भी लिखने की कहाँ जरुरत हैं तुम खुद बहुत समझदार हो पर बीते वक़्त में तुम जैसे जी रही हो, जो सोच रही हो वो सब देखा तो मुझे तुम्हें लिखना जरुरी लगा, तुम एक मंजिल पर ठहर क्यों रही हो? 

आज्ञा दीजिए यशोदा को...
फिर मिलते हैं...
सादर





बुधवार, 18 मई 2016

306...........एक सेवानिवृत पति की दिनचर्या का हाल

सादर अभिवादन स्वीकार करें

बैठे थे
अपनी मस्ती में
कि
अचानक तड़प उठे,
आ कर
तुम्हारी याद ने
अच्छा नहीं किया।

कलम चल रही जरा धीरे धीरे
भाव बन रहे मगर धीरे धीरे।

उम्मीदों की जिद कायम है अब भी
शब्द बंध रहे हैं जरा धीरे धीरे।

मन पाए विश्राम जहाँ.....अनीता
अभी शुक्रगुजार है सांसें
भीगी हुईं सुकून की बौछार से
अभी ताजा हैं अहसास की कतरें
डुबाती हुई सीं असीम शांति में
अभी फुर्सत है जमाने भर की
बस लुटाना है जो बरस रहा है



लो
जा रही है कविता
उस गली में
रंग इतने सारे लगा कर
मुझसे आँख बचा कर
मेरी धड़कन की ध्वनि लिए
रच रही एक सन्नाटा


नारी हूँ तो क्या 
कमज़ोर नहीं हूँ 
माँ बहन बेटी पत्नी 
सब हूँ पर सशक्त भी हूँ मैं


अम्बर प्यासा धरती प्यासी राहें मेघों की भटकी हैं
तरुवर प्यासे चिड़िया प्यासी कलियाँ सूखी सी लटकी हैं
खेतों की वीरानी में कोलाहल सूखे का गूँज रहा
अपनी करनी पर पछताती मानव की साँसें अटकी हैं

कविता मंच.....हितेश शर्मा
क़यामत से ही बस इक उम्मीद बाकी हो जिसे
फिर उसके लिए जहर से उम्दा जाम क्या होगा

उनके इंतज़ार ने अब तक इस दिल को ज़िंदा रखा
उनसे मिलने से अच्छा भला और पैगाम क्या होगा


और अंत में आज की शीर्षक कड़ी..
अन्तर्मथन.....डॉ. टी. एस. दराल
एक सेवानिवृत पति की दिनचर्या का हाल
डॉक्टर साहब , मेरे पति सारी रात नींद में बड़बड़ाते हैं , कोई अच्छी सी दवा दीजिये।
डॉक्टर : ये दवा लिख रहा हूँ , केमिस्ट से ले लेना।  रोज एक गोली सुबह शाम लेनी है।  आपके पति बड़बड़ाना बंद  कर देंगे।
पत्नी : नहीं नहीं डॉक्टर साहब , आप तो कोई ऐसी दवा दीजिये कि ये साफ साफ बोलना शुरू  दें।  पता तो चले कि ये नींद में किसका नाम लेते हैं।
डॉक्टर : बहन जी , ये दवा आपके पति के लिए नहीं , आपके लिए है। आप उन्हें दिन में बोलने का मौका दें , वे नींद में बड़बड़ाना अपने आप बंद  कर देंगे।

आज्ञा दें यशोदा को
कल यदि संजय भाई नहीं दिखे तो फिर मिलूँगी


मंगलवार, 17 मई 2016

305....दहेज़ की लोभी इस संसार में, दहेज़ की भेंट छड़ी हूँ मैं। !

जय मां हाटेशवरी...


एक कवि नदी के किनारे खड़ा था !
तभी वहाँ से एक लड़की का शव नदी में तैरता हुआ जा रहा था।
तो तभी कवि ने उस शव से पूछा --

"कौन हो तुम ओ सुकुमारी,बह रही नदियां के जल में ?
कोई तो होगा तेरा अपना,मानव निर्मित इस भू-तल मे !
किस घर की तुम बेटी हो,किस क्यारी की कली हो तुम
किसने तुमको छला है बोलो, क्यों दुनिया छोड़ चली हो तुम ?
किसके नाम की मेंहदी बोलो, हांथो पर रची है तेरे ?
बोलो किसके नाम की बिंदिया, मांथे पर लगी है तेरे ?
लगती हो तुम राजकुमारी, या देव लोक से आई हो ?
उपमा रहित ये रूप तुम्हारा, ये रूप कहाँ से लायी हो?"
""दूसरा दृश्य--""
कवि की बाते सुनकर,, लड़की की आत्मा बोलती है..

"कवी राज मुझ को क्षमा करो, गरीब पिता की बेटी हुँ !
इसलिये मृत मीन की भांती, जल धारा पर लेटी हुँ !
रूप रंग और सुन्दरता ही, मेरी पहचान बताते है !
कंगन, चूड़ी, बिंदी, मेंहदी, सुहागन मुझे बनाते है !
पति  के सुख को सुख समझा, पति  के दुख में दुखी थी मैं !
जीवन के इस तन्हा पथ पर, पति के संग चली थी मैं !
पति को मेने दीपक समझा, उसकी लौ में जली थी मैं !
माता-पिता का साथ छोड, उसके रंग में ढली थी मैं !
पर वो निकला सौदागर, लगा दिया मेरा भी मोल !
दौलत और दहेज़ की खातिर, पिला दिया जल में विष घोल !
दुनिया रुपी इस उपवन में, छोटी सी एक कली थी मैं !
जिस को माली समझा, उसी के द्वारा छली थी मैं !
इश्वर से अब न्याय मांगने, शव शैय्या पर पड़ी हूँ मैं !
दहेज़ की लोभी इस संसार में, दहेज़ की भेंट छड़ी हूँ मैं। !

अब पेश है कुछ चुनी हुई रचनाएं...
उज्जयिनी का सिंहस्थ कुम्भ महापर्व
s320/sihansth
s320/Mahakaal
s320/sihansth2016
s320/ujjain%2Bsihansth
s320/kumbh
त'
प्राप्त हुआ।
s320/ujjain%2Bbath
अमृत को लेकर देवता और दानवों में पुनः मतभेद हो गया और उनके बीच 12 दिनों तक युद्ध हुआ लेकिन जिस कुंभ में यह अमृत भरा पड़ा था, उसे कोई भी दल प्राप्त नहीं
कर सका। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया और वे नाचती-नाचती संघर्ष स्थल पर पहुंची और उन्होंने अपनी युक्ति से कुंभ में रखे अमृत का वितरण किया।
s320/kumbh
अमृत कुंभ को प्राप्त करने के लिए देवताओं व दानवों के 12 दिन के युद्ध के फलस्वरूप अब 'कुंभ' रखा गया। लेकिन शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर केवल 4 स्थानों
पर कुंभ रखा गया- हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। यही कारण है कि सिर्फ इन चार स्थानों पर कुंभ मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि मानव जितने समय को एक वर्ष
की अवधि मानता है, उतना ही समय देवताओं के लिए केवल एक दिन के बराबर होता है। इस अनुपात से युद्ध के 12 दिनों को मानव समाज 12 वर्ष गिनता है और

सच्चा प्यार
एक ही ज़मीन पर आ खड़े हुए हैं ये दोनों
किसी अद्रश्य हाथ ने लाखों करोड़ों की भीड़ से उठाकर
अगर इन्हें पास-पास रख दिया
तो यह महज़ एक अँधा इत्तिफाक था
लेकिन इन्हें भरोसा है कि इनके लिए यही नियत था
कोई पूछे कि किस पुन्य के फलस्वरूप?
नहीं, नहीं, न कोई पुन्य था, न कोई फल है

अबके बरस बरसात न बरसी ........
मेरी दुआ के साये तले बसेरा कर लो
लड़खड़ाते हैं ये कदम तुम्हारे तो क्या
मेरे मन के इस विश्वास का सहारा ले लो
साँसे मेरी अब थमने को हैं तो क्या
अपनी यादों में ही जिंदगी मुझे दे दो

आदमी इश्‍क में बदजुबां हो जाता है.....
भंवर आता है फि‍र कोई
झील में समुद्र जैसा
कहां होती है झील के पास
समुद्र सी वि‍शालता
कि‍ खुद में नदि‍यों को समो ले
उफना जाती है झील
पानी के तल में काई बैठ जातीी है
सब धुंधलाने लगता है

अमर शहीद सुखदेव जी की १०९ वीं जयंती
s320/Sukhdev
लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिये जब योजना बनी तो साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा राजगुरु का पूरा साथ दिया था। यही नहीं, सन् १९२९
में जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किये जाने के विरोध में राजनीतिक बन्दियों द्वारा की गयी व्यापक हड़ताल में बढ-चढकर भाग भी लिया था । गांधी-इर्विन
समझौते के सन्दर्भ में इन्होंने एक खुला खत गांधी जी के नाम अंग्रेजी में लिखा था जिसमें इन्होंने महात्मा जी से कुछ गम्भीर प्रश्न किये थे। उनका उत्तर यह मिला
कि निर्धारित तिथि और समय से पूर्व जेल मैनुअल के नियमों को दरकिनार रखते हुए २३ मार्च १९३१ को सायंकाल ७ बजे सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह तीनों को लाहौर सेण्ट्रल
जेल में फाँसी पर लटका कर मार डाला गया। इस प्रकार भगत सिंह तथा राजगुरु के साथ सुखदेव भी मात्र २३वर्ष की आयु में शहीद हो गये ।

मां की व्हील चेयर के पीछे क्या है...
फिक्र में बच्चों की यूं हर दम घुली जाती है मां
नौजवां होते हुए भी बूढ़ी नजर आती है मां....
जिंदगानी के सफर में गर्दिशों की धूप में
कोई साया नहीं मिलता तो याद आती है मां
सबको देती है सुकूं और खुद गमों की धूप में
रफ्ता रफ्ता बर्फ की सूरत पिघल जाती है मां
दर्द, आहें, सिसकियां, आंसू, जुदाई, इंतजार
जिंदगी में और क्या औलाद से पाती है मां
प्यार कहते हैं किसे और मामता क्या चीज है
कोई उन बच्चों से पूछे जिनकी मर जाती है मां.....

अब चलते-चलते पहड़ें...
Kitchen Tips-Bhag 7
आपकी सहेली
 पर
 ज्योति देहलीवाल 
धन्यवाद।

















सोमवार, 16 मई 2016

304...पुरानी दोस्तियां बनी भी रहती हैं. हार कर,


हम पाँच लिंकों का परिवार की ओर से
सादर अभिवादन स्वीकारें

"तुम पर भी यकीन है और मौत पर भी ऐतबार है,"
"देखें पहले कौन मिलता है , हमें दोनों का इंतजार है ....

देखिए आज की पढ़ी रचनाएं क्या कहती है..



किसी भी शहर में ऐसे नज़ारे आम हैं 
जहां सुबह-सबेरे अधिकाँश बंगलों में कारें, कुत्ते, आंगन, गलियारों पर 
हजारों लीटर पानी की बर्बादी एक शगल है, बिना किसी झिझक या अपराध बोध के। 
इनके लिए पानी की राष्ट्रव्यापी  समस्या की खबर उतनी ही अहमियत रखती है 
जितनी किसी शुक्रवार को किसी फिल्म की रिलीज !


ठण्ड लगे जब आपको, सर्दी से बेहाल, 
नीबू मधु के साथ में, अदरक पियें उबाल.

अदरक का रस लीजिये. मधु लेवें समभाग, 
नियमित सेवन जब करें, सर्दी जाए भाग.

रोटी मक्के की भली, खा लें यदि भरपूर, 
बेहतर लीवर आपका, टी० बी० भी हो दूर

आस्था के बल पर गर्म, धर्म के सब दुकान 
अन्धविश्वास बिकता है, सच्ची भक्ति बदनाम

रूह चलाती काय को, यही आत्मा का गुण 
काया में बसी आत्मा, खुद रूपहीन अगुण 


कांग्रेसी छतरी में छेद
सन 2014 की ऐतिहासिक पराजय के दो साल अगले हफ्ते पूरे होने जा रहे हैं। 
इन दो साल में पार्टी ढलान पर उतरती ही गई है। गुजरे दो साल में एक भी घटना ऐसी नहीं हुई, 
जिससे पार्टी की पराजित आँखों में रोशनी दिखाई पड़ी हो। पिछले दो साल में हुए चुनावों में उसे कहीं सफलता नहीं मिली। पार्टी ‘परिवार’ की छाया है। जिससे न तो वह बच सकती है और न उसके तले खड़े होकर शांति से जी सकती है। लोकसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी कार्यसमिति की बैठक में कहा गया था कि पार्टी के सामने इससे पहले भी चुनौतियाँ आईं हैं और उसका पुनरोदय हुआ है?? 

आज की शीर्षक कड़ी....

मन को अच्‍छा नहीं लगता, मगर पुरानी दोस्तियां पीछे छूटती जाती हैं. 
किसी खोज में निकलो तो समुदाय, परिवार, पुराने सम्‍बन्‍धों का सहारा काम नहीं आता, 
अंधेरों में दूर तक आवारा, अकेले तैरकर ही समझ बनती है. या नहीं भी बनती और आप दीवाने बने, 
दीवारों पर सिर पीटकर सब खत्‍म कर लेने की पंक्तियां चुभलाते रहते हो.

इज़ाज़त देॆ यशोदा को

और मात्र 8 मिनिट दें...देखें ये वीडियो
Dangerous & Breathtaking Train Route on Earth


रविवार, 15 मई 2016

303...जी हाँ , ये मन की अवस्थाएँ हैं :)

सादर अभिवादन..
आज भाई विरम सिंह को आना था
पर रात-दिन पढ़ाई की थकान उतार रहे हैं

पढ़ तो मैं भी रही हूँ...उसी में से कुछ आपके साथ साझा कर रही हूँ

कफन के नाम पर  भी नफा नुकसान दिखता है 
रंग खून का एक है पर छोटा बड़ा इंसान दिखता है 
रोटी कपड़ा मकान का प्रश्न सदियों से उबल रहा 
फुटपाथ पर इंसान, महलों में भगवान दिखता है -


हरी दूब की ओस पर, बिछा स्वर्ण कालीन 
कोमल तलवों ने छुआ, नयन हुए शालीन 

छँट जाती है कालिमा, जम जाता विश्वास
जब आती है लालिमा, पूरी करने आस

आइए, आज थोड़ा और धार्मिक हो जाएं :)
ये प्रस्तुति लीक से ज़रा हटकर है...


भारत एक अजीब देश है , कहते है यह एक सेक्युलर देश है मतलब हिन्दू लॉ या शरिया कई कोई असर देश के कानून  पर नहीं पड़ना चाहिए , सबके लिए एक सामान कानून होना चाहिए जो धर्म आधारित नहीं हो  पर ...... हिन्दू तीर्थ यात्री रोड टैक्स देते है पर मुस्लिमो को हज सब्सिडी दी जाती है क्यों?
ऐसे कई उदहारण है फिर भी कहते है भारत सेक्युलर देश है |
मगर कैसे ये कम से कम मुझे तो समझ नहीं आता|

और ये है आज की शीर्षक रचना..

दिल ...दिमाग ...और हम..... डॉ. प्रतिभा स्वाति
ठीक है यदि दिल सोच नहीं सकता तो हम उस सोच की तरफ़ चलें
जहां दिमाग सीधा हस्तक्षेप  नहीं  करता ! मनोविज्ञान ने  अपना जाल धीरे -से  फैलाया ________
चेतन - अर्धचेतन -अचेतन ______ जी हाँ , ये मन  की अवस्थाएँ हैं :)


आज्ञा दें यशोदा को
फिर मिलते हैं



Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...