सादर अभिवादन
माह सितम्बर का सूर्य
अस्ताचल की ओर...
अस्ताचल की ओर...
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संगम दो उत्सवों का कल
संगम दो उत्सवों का कल
देवी विसर्जन व दशहरा
एक साथ..
एक साथ..
......
एक बार फिर कुआंरी पूजन
औेर कन्या भोजन..
.......
एक बार फिर कुआंरी पूजन
औेर कन्या भोजन..
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आज है मेरी पसंद...
खड़ी-पड़ी आकृतियाँ
इंसानी सी शक्लों की
झोंकें हैं अपने को
अपनी अपनी लय में,
भर भर आँखों से
कराने को निर्जीव देह
का अग्नि स्नान चिता पर
हर युग में परीक्षा मेरे अस्तित्व की है
सीता मैं राम की,अग्नि स्नान किया
द्रौपदी मैं,बँटी वस्तु सम पाँच पुरुष में
मैं सावित्री यम से ले आयी पति प्राण,
ज़िन्दगी की किताब के पन्ने.. लोकेश नदीश
गूंजने लगी हैं कान में
वो तमाम बातें
जो कभी हमने की ही नहीं
नज़र आई कुछ तस्वीरें
जो वक़्त ने खींच ली होगी
कलियों का मुस्कुराना....अज्ञात
आज़ादियाँ कहाँ वो, अब अपने घोसले की;
अपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जाना;
लगती हो चोट दिल पर, आता है याद जिस दम;
शबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुराना;
किंकर्तव्यविमूढ....पुरुषोत्तम सिन्हा
रच लेता हूँ मन ही मन इक छोटा सा संसार,
समय की बहती धारा में मन को बस देता हूँ उतार,
सरसराहट होती, नैया जब बहती बीच धार,
निरुत्तर भावों से मैं फिर देखता, समय का विस्तार!
बदल गये हो......अमित जैन 'मौलिक'
डबडबाती कोरों
से भी देखा,
दिखते तो हो तुम!
पर वैसे नही
जैसे दिखते थे
संभवतः तुम
बदल गये हो
हाँ!! तुम
बदल गये हो।

उलूक का पन्ना....डॉ. सुशील जोशी
टुकड़ा टुकड़ा
फटने के लिये
चाहते हुऐ भी
बट जाना
हर किसी
की सोच के
अनुसार
उसके लिये ।
आज्ञा दें यशोदा को
ज़िन्दगी की किताब के पन्ने.. लोकेश नदीश
गूंजने लगी हैं कान में
वो तमाम बातें
जो कभी हमने की ही नहीं
नज़र आई कुछ तस्वीरें
जो वक़्त ने खींच ली होगी
कलियों का मुस्कुराना....अज्ञात
आज़ादियाँ कहाँ वो, अब अपने घोसले की;
अपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जाना;
लगती हो चोट दिल पर, आता है याद जिस दम;
शबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुराना;
किंकर्तव्यविमूढ....पुरुषोत्तम सिन्हा
रच लेता हूँ मन ही मन इक छोटा सा संसार,
समय की बहती धारा में मन को बस देता हूँ उतार,
सरसराहट होती, नैया जब बहती बीच धार,
निरुत्तर भावों से मैं फिर देखता, समय का विस्तार!
बदल गये हो......अमित जैन 'मौलिक'
डबडबाती कोरों
से भी देखा,
दिखते तो हो तुम!
पर वैसे नही
जैसे दिखते थे
संभवतः तुम
बदल गये हो
हाँ!! तुम
बदल गये हो।

उलूक का पन्ना....डॉ. सुशील जोशी
टुकड़ा टुकड़ा
फटने के लिये
चाहते हुऐ भी
बट जाना
हर किसी
की सोच के
अनुसार
उसके लिये ।
आज्ञा दें यशोदा को





