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रविवार, 3 सितंबर 2017

779....उसका जरूर पढ़ना पर लिखना खुद अपना

सादर अभिवादन..
एक शुभ सूचना...
पाँच लिंकों का आनन्द परिवार नें
एक सितम्बर से......
एक नया ब्लॉग जोड़ा है अपने परिवार में
ये सांध्य दैनिक है..
इसमें आप पाएँगे..
खट्टी, मीठी, कड़वी और फीकी
रचनाएँ..नमकीन नहीं है इसमें
नाम है विविधा.....
यह ब्लॉग आप सभी के लिए खुला है....

आज की पढ़ी रचनाओँ से.....

एक वादा था तुमसे
जो खेल खेल में कर दिया
जमीं पे तारे और पूनम के चाँद का ।
काम जरा मुश्किल सा था

कमल कितने ही जीवन के खिलते हैं इसकी जल में,
शान्त लगती ये जितनी उतनी ही प्रखर तेज उसके,
मौन आहट में उसकी स्वर छुपते हैं जीवन के,
बात अपने मन की कहने को ये आतुर नही समुन्दर से।

सज के आए हैं महफ़िल में  मेरे सनम ।
इक  नज़र  भर  मेरी  फेरने  के   लिए ।।

कहकशां   से   भी  आवाज़ आई   बहुत ।
चाँद  क्यों  छल   रहा   जीतने के  लिए ।।

मेरी-तुम्हारी सोच से कही परे था...
अमृता,साहिर और इमरोज़ को समझना...
इक ऐसी उलझन,
जिसे जैसे कोई सुलझाना ही ना चाहता हो..

शमशीरें निकल पड़ीं, वो देखती रही, 
हश्र क्या होगा इसका? जानती थी वो।

अंजाम कुछ भी, उसे फ़र्क नहीं पड़ता,
जीत उनकी तय थी, ये जानती थी वो।


मन की पाँखी में...देहरी
अंजुरी भर
तृप्ति की चाह लिये
अतृप्ति के अनंत
प्यास में तड़पता है
नादान है कितना
समझना नहीं चाहता


विविधा में....गुरु
ये उर्वर पृथ्‍वी, 
ये खुला आकाश, 
ये बहती हवाऐं, 
ये जलती आग, 
ये बहता पानी, 
ये तैरती मछलियाँ
ये  सुबह उठता सूरज, 

ये रात बिताता चांद, 



उलूक टाईम्स की एक कतरन
लिख वही जो तू 
खुद लिख सकता है 
छंद अलंकार व्याकरण 
को बीच में लायेगा 
जो है वो भी नहीं रहेगा 
जो बनेगा उसको 
कोई सरकस वाला 
जरूर उठा के ले जायेगा 
ये लेखन की दुनिया 
बहुत बडी़ भूलभुलईया है 












:: आज के रचनाकार :: 
मीना भारद्वाज, पुरुषोत्तम सिन्हा, नवीन मणि त्रिपाठी, 
सुषमा वर्मा, राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही", श्वेता सिन्हा,
अलकनन्दा सिंह 
एवं डॉ. सुशील जोशी


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