तीस अक्टूबर को सभी अखबारों के कर्मचारियो की छुट्टी थी
अखबार न छपे न बटे इकतीस अक्टूबर को
कल लौह पुरुष सरदार पटेल का जन्मदिन था
सादर नमन उनको

31 अक्टूबर, 1875-15 दिसम्बर 1950
उनके निधन के अवसर पर स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन की लिखी एक कविता
अखबार न छपे न बटे इकतीस अक्टूबर को
कल लौह पुरुष सरदार पटेल का जन्मदिन था
31 अक्टूबर, 1875-15 दिसम्बर 1950
उनके निधन के अवसर पर स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन की लिखी एक कविता
यही प्रसिद्ध लोहपुरुष प्रबल,
यही प्रसिद्ध शक्ति की शिला अटल,
हिला इसे सका कभी न शत्रु दल,
पटेल पर
स्वदेश को
गुमान है ।
सुबुद्धि उच्च श्रृंग पर किये जगह,
हृदय गंभीर है समुद्र की तरह,
कदम छुए हुए ज़मीन की सतह,
पटेल देश का
निगहबान है ।
हरेक पक्ष के पटेल तौलता,
हरेक भेद को पटेल खोलता,
दुराव या छिपाव से इसे गरज ?
कठोर नग्न सत्य बोलता ।
पटेल हिंद की निडर जबान है ।
- हरिवंशराय बच्चन (1950)
आज की पसंदीदा रचनाएँ....

इंतजार................ संजय वर्मा 'दृष्टि'
एक घर में उदास बैठी मां से
उदासी का कारण पूछा
तो किसी ने बताया कि -
इनकी बिटिया को क्रूर लोगों ने
गर्भ में ही मार दिया
जब से उदास है

इसी उम्मीद से.......सालिहा मंसूरी
हर-सुबह इसी उम्मीद से
उठती हूँ कि कभी न कभी
इक न इक दिन वो सुबह भी
जरूर आएगी जब तुम मेरा
हाँथ अपने हाँथों में थामकर

यादें.... मीना भारद्वाज
फुर्सत के पलों में तेरे साथ जिया
हर लम्हा याद आता है।।
हफ्तों से गुमसुम बादलों से ढका
आसमान का वो खाली कोना याद आता है।

खुश है जमाना आज .... अविनाश वाचस्पति
रोजाना नई स्कीमें लांच की जा रही हैं जो कि नि:संदेह मूर्ख बनाने की फैक्टरियां हैं – तीस रुपये खर्च करके दो हजार एसएमएस एक महीने में फ्री। यह मूर्खता एक रुपये रोजाना की दर से बेची जा रही है। इसी प्रकार कई मूर्खताएं दस रुपये रोजाना अथवा 200 रुपये महीने में भी धड़ल्ले से बिक रही हैं जिनमें आपको एक खास अपने नेटवर्क पर अनलिमिटेड टॉक टाइम दिया जाता है और आप अपने जीवन के कीमती पलों को फिजूल की बातें कर करके गर्क कर लेते हैं और अपनी बुद्धिमानीय कला पर मोहित होते हैं।

फ़िल्मी गानों की धुनों पर साहित्य चर्चा....गोपेश जैसवाल
‘इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में, कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरालहरा यह शाखाएँ, कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ, हँसकर कहती हैं मगन रहो,
आज का शीर्षक..

देशभक्ति
मन में होने
से कुछ
नहीं होता है
दिखानी
पड़ती है
उसकी
फोटो
लगाकर
सामने से
पूजा अर्चना
का थाल
सजाये हुऐ
अपने को
साथ में
दिखाकर
.......
आज्ञा दें यशोदा को
सादर
आज की पसंदीदा रचनाएँ....

इंतजार................ संजय वर्मा 'दृष्टि'
एक घर में उदास बैठी मां से
उदासी का कारण पूछा
तो किसी ने बताया कि -
इनकी बिटिया को क्रूर लोगों ने
गर्भ में ही मार दिया
जब से उदास है
इसी उम्मीद से.......सालिहा मंसूरी
हर-सुबह इसी उम्मीद से
उठती हूँ कि कभी न कभी
इक न इक दिन वो सुबह भी
जरूर आएगी जब तुम मेरा
हाँथ अपने हाँथों में थामकर
यादें.... मीना भारद्वाज
फुर्सत के पलों में तेरे साथ जिया
हर लम्हा याद आता है।।
हफ्तों से गुमसुम बादलों से ढका
आसमान का वो खाली कोना याद आता है।
खुश है जमाना आज .... अविनाश वाचस्पति
रोजाना नई स्कीमें लांच की जा रही हैं जो कि नि:संदेह मूर्ख बनाने की फैक्टरियां हैं – तीस रुपये खर्च करके दो हजार एसएमएस एक महीने में फ्री। यह मूर्खता एक रुपये रोजाना की दर से बेची जा रही है। इसी प्रकार कई मूर्खताएं दस रुपये रोजाना अथवा 200 रुपये महीने में भी धड़ल्ले से बिक रही हैं जिनमें आपको एक खास अपने नेटवर्क पर अनलिमिटेड टॉक टाइम दिया जाता है और आप अपने जीवन के कीमती पलों को फिजूल की बातें कर करके गर्क कर लेते हैं और अपनी बुद्धिमानीय कला पर मोहित होते हैं।
फ़िल्मी गानों की धुनों पर साहित्य चर्चा....गोपेश जैसवाल
‘इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में, कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरालहरा यह शाखाएँ, कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ, हँसकर कहती हैं मगन रहो,
आज का शीर्षक..

देशभक्ति
मन में होने
से कुछ
नहीं होता है
दिखानी
पड़ती है
उसकी
फोटो
लगाकर
सामने से
पूजा अर्चना
का थाल
सजाये हुऐ
अपने को
साथ में
दिखाकर
.......
आज्ञा दें यशोदा को
सादर