शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कुसुम कोठारी जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।
कल होली तो हो ली...
आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
संस्कारों का अंत हो तुम
लालच की पराकाष्ठा
अनैतिकता का बाना
भ्रष्टाचार के जनक
स्वार्थ के सहोदर
धर्म के धुंधले होते रंग
विषज्वर के आरोही हो।।
सबने खेली
रंग गुलाल लिए
होली होली है
इस बार होली में
अजीब नज़ारा देखा,
गुब्बारा एक चला,
पर घायल कई हो गए.
ताड़ना की अभिव्यक्ति को मोक्ष
दे पाएं,
नारी समतल धरातल की निर्विवाद
अधिकारी हो जाये।
रंगों से भरे दिल में फोड़ आये
मैंने कहा खुद ही से अरे,
बुरा न मानों होली है!!!!
मुश्किल है
हिय का
तर्पण,
रंगीन देह की थी अपनी अलग सीमाएं,
कोलाहल थमते ही लहरों ने किया
आत्म समर्पण।
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रवीन्द्र सिंह यादव