शीर्षक: आदरणीय दिगंबर नासवा जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पाँच रचनाओं के लिंक लेकर हाज़िर हूँ।
आइए पढ़ें आज की पसंदीदा रचनाएँ-
धरती पे लदे धान के खलिहान हैं हम भी...
गर तुम जो अमलतास की रुन-झुन सी लड़ी हो,
धरती पे लदे धान के खलिहान हैं हम भी.
अपने इससे दूर हो जाते
दूजे इसके पास है जाते
दूरपास का ये खेल सारा
नहीं है कोई इसके जैसा
ये तेरा....
अब आवाज़ में, वो कशिश नहीं बाक़ी,जो कभी थी,
वाक़िफ़ चेहरा भी तलाशता है भूल जाने का बहाना,
फीकी पड़ती चमक चाँदनी
छँटने लगे भ्रम के जाले
हंसा पी की पुकार लगाए
जिह्वा पड़ते रहते छाले
हर एक व्यक्ति
हर दूसरे व्यक्ति की ओर
इशारा करता हुआ कहता है।
कहते हुए वह झाड़ रहा होता है अपने कपड़े
और साथ ही अपनी जीभ।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव