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शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

3540 ... प्रेम

        हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...

सुनो जोगी! तुम्हारा झोला मेरे पास छूट गया है उसमें तीन किताबें हैं पहली किताब ज्ञान की है उसके भारी-भरकम शब्दों को दायें-बायें खिसकाकर मैंने प्रेम की राई पसार दी है। सुनीता जैन के रचनाओं के द्वारा हमें मानवीय संवेदनाओं के विभिन्न पहलूओं को जानने का मौका मिलता है। इस कविता संग्रह में स्त्री-भावों की विभिन्न संवेदनाओं को व्यक्त किया है। इस कविता संग्रह में मानो रस की धारा निरंतर बढ रही है। अपनी समीक्षा में प्रियंका भारद्वाज कहती है “ यह संग्रह स्त्री के स्वानुभूत सत्य का प्रकाष है। यहाॅं स्त्री-प्रेम का वह माध्यम है जिसमें पुरुष के समस्त राग-विराग , समाहित रहते है। पुरुष के जीवन-व्यवहारों, व्यापारों और परिवेषजन्य विसंगतियों-असंगतियों का उदात्त एकीकरण या संग्रहण ही स्त्री-सौंदर्य है जिसे वह प्रेम के द्वारा परिष्कृत करती है। नारी चेतना का ही चरम है, जहाँ वह यह कहती है- ? मैं उन औरतों में नहीं हूँ, जो अपने व्यक्तित्व का बलिदान करती है, जिनकी कोई मर्यादा और शील नहीं होता है। मैं न उनमें हूँ, जिनके चरित्र पर पुरुष की हवा लगते ही खराब हो जाते हैं और न पति की गुलामी को सच्चरित्रा का प्रमाण मानती हैं। मुझमें आत्मनिर्भरता भी है और आत्मविश्वास भी। मुझे स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता है तो पति और परिवार के साथ सामंजस्य बनाने की शक्ति भी। अतः जीवन के यथार्थ को स्वीकार करने में कोई झिझक भी नहीं है। जिस प्रकार एक कुरूपा स्त्री अलंकार धारण करने से सुन्दर नहीं हो सकती उसी प्रकार अस्वाभाविक, भद्दे और क्षुद्र भावों को अलंकारस्थापना सुन्दर और मनोहर नहीं बना सकेगी। महाराज भोज ने भी अलंकार को 'अलमर्थमलंकर्तु' अर्थात् सुन्दर अर्थ को शोभित करने वाला ही कहा है। इस कथन से अलंकार आने के पहले ही कविता ? की सुन्दरता सिद्ध है। जिन्दगी क्या? तब बस देखा करती थी, शायद 6-7 बरस की रही होऊंगी मैं; यही सब कि लौहपीटोंके बच्चों के पैरों में चप्पल नहीं हैं, मेरे पैरों में है या कि कितनी बहुत गर्मी है और मज़दूर धूप में काम कर रहे हैं या कि किस तरह उस मुर्गे को काटा गया था जो अब रात के भोजन में मेरी कटोरी में है। आगे, जब पढ़ना सीखा तो समझिये, पूरी दुनिया को पढ़ डालना चाहती थी ।


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पुनः भेंट होगी...
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