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गुरुवार, 8 सितंबर 2022

3510...पर तुमने तो बादल ही सुखा दिए...

शीर्षक पंक्ति:डॉ.(सुश्री) शरद सिंह जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

गुरुवारीय अंक में पाँच रचनाओं के लिंक्स व अंश लेकर हाज़िर हूँ।

रेशमी एहसास...

वो जानते हैं झाँकोगी तुम खुली खिड़की से  
छुओगी नर्म हथेली से वो रेशमी एहसास ...  
ठीक उसी वक़्त मैं भी हो जाऊँगा धुँवा-धुँवा  
घुल जाऊँगा बादलों की नर्म छुवन में

कविता

बंट जाता है जब मन

तितर-बितर हो गये मेघों की तरह

कुंद हो जाती है धार मेधा की

लेंस से निकली किरणों की तरह

एकीभूत हुई चेतना  स्रोत है सृजन का

गोमुख से ही झरा करती है गंगा

कविता | तुमने तो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पर तुमने तो

बादल ही सुखा दिए

मेरे आसमान के!

प्रौढ़ावस्था में सावधान-सतीश सक्सेना

अगर आपको अपने शरीर की सीमाओं का ज्ञान नहीं और आपके अंग आपके मित्र नहीं तब यकीनन वे आपका संग नहीं देंगे और साठ के आसपास वे कभी भी आपका संग छोड़ देंगे, मेरे बहुत सारे मित्र शरीर की इस चीत्कार को अनसुना कर रिटायरमेंट के बाद भी पैसे कमाने के जतन में लगे रहते हैं, यह इस उम्र में बेहद खतरनाक भूल है जो सम्हलने का मौका भी नहीं देगी! 

इल्ज़ाम मिलता रहेगा...

दरबारी कलम लिखेगी जब भी लिखेगी,

हिंद को मानसिक गुलाम मिलता रहेगा।

रोज मरने की आदत पुरस्कृत होती रही,

बाद बेगुनाही के इल्ज़ाम मिलता रहेगा।

 *****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


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