शीर्षक पंक्ति:आदरणीया श्वेता सिन्हा जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पाँच रचनाओं के साथ हाज़िर हूँ।
विशेष!
पढ़िए सालभर पूर्व रचित एक लोकप्रिय रचना-
तीख़ी धूप की झुलसन से
रेत पर पड़ी मछलियों की भाँति
छटपटाने लगती हूँ
किसानों की तरह जीवट नहीं
ऋतुओं की तीक्ष्णता सह नहीं पाती
मैं बीज भी तो नहीं
जो अंकुरित होकर
धान की बालियाँ बने
आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
वीर या श्रृंगार करुणा
नव रसो का मेह छलका
रूप कितने ही हैं इसके
ताल में ज्यों चाँद झलका
कंटकों सी ले चुभन तो
रात रानी बन लहकती।।
सांसों की कच्ची-पक्की बुग्नी में
जहाँ गढ़ी हो दर्द की नुकीली कीलें
और न निकलने वाले काँटों का गहरा एहसास
हिन्दी – हिंदुस्तानी – हिन्दी दिवस
लड़कियों की प्रिन्सीपल की आँखों में गर्व और शिक्षा निदेशक महोदय की आँखों में सन्तोष का भाव था ।
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आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे आगामी गुरुवार।
रवीन्द्र सिंह यादव