सादर अभिवादन
सोची थी नहीं आऊँगी
पर सखी भी न
एक सप्ताह और लगा दीजिए कहा
मुझे भी आनन्द ही आता है
देखिए रचनाएँ ....
"मैंने सभी प्रकार के मुख्य शल्य क्रिया का शुल्क एक कर देने का निर्णय लिया है। इससे समाज में यह सन्देश जायेगा कि हमारे अस्पताल में प्रसव से धन उगाही के उद्देश्य से शल्य क्रिया नहीं की जाती। मेरे इस निर्णय से आपलोग भी सहमत होंगे, ऐसी उम्मीद करता हूँ।"
अस्पताल के प्रबंधक ने अपनी मंडली के सम्मुख कहा।
पता नहीं
कब समझ में आयेगा
उल्लू के पट्ठे ‘उलूक’ को
आदतन कुछ भी नहीं लिखे हुऐ को
खींच तान कर हमेशा
कुछ बन ही जायेगा
की समझ लिये हुऐ बेशरम
कई दिनों के सन्नाटे से भी
निकलते हुऐ
भौंपूँ बजाने से बाज नहीं आता है।
सजा भस्म आसन पर बैठे
शंकर शंभू कैलाशी।
तीन लोक के पालनहारी
अजर अमर अविनाशी।
शीश गंग पर सदा विराजे
पहने मृगछाला चोला।
गौरा जी से ब्याह....
उन हथकड़ियों ने धीरे से
कब अपनी जगह बनाली
चूड़ियों खन खन बोलतीं
अपनी उपस्थिति दर्ज करातीं |
खग औ बिहग सबै केउ ब्याकुल
देस बिदेस हर एक कुनबा कुल
अइसा जुद्ध जे छेड़े बिदेसी
हमरी आँख भर आई ।।
नान्हें नान्हें लड़िका धुआँ सने हैं
घर फुलवरिया जले पड़े हैं
मर्द मेहरुआ सब मरि कटि जाएँ
ऐसी मिसाइलि चलाई ।।
आज बस
सादर