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सोमवार, 9 अगस्त 2021

3115-----और बच्चा बन के मैं बाहों में इतराता रहा ...

 नमस्कार !  आज के पाँच लिंक्स के आनंद में आप सभी का स्वागत है । यूँ तो दिनांक 7 से ही  हम सब स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं क्यों कि ओलंपिक खेलों में नीरज चोपड़ा ने  स्वर्ण पदक जीत कर इतिहास  रच दिया है  |  वैसे हर खिलाड़ी ने ही अपना सर्वश्रेष्ठ  प्रदर्शन किया होगा .... आगे आने वाले समय में  हमारे खिलाड़ी और अच्छा प्रदर्शन करें  यही कामना है ...

 चलिए इसी उम्मीद के साथ प्रारम्भ करते हैं आज के लिंक्स की चर्चा --- 

आपको खेलों में  पदक  तो चाहिए लेकिन अपनी मानसिकता को बदल नहीं सकते । थोड़ा अपनी सोच बदलें तो शायद और जीत के परचम लहरायें यही  बता  रही हैं प्रीति अलग अपने लेख में ---

और मैडल चाहिए? तो उन्हें 'घर संभालने' की अनिवार्य शर्त से मुक्ति दिलाइये




'लड़की घर भी संभाल लेगी, और मैडल भी जीत लेगी'. टोक्यो ओलंपिक में भारतीय महिला एथलीटों के उत्कृष्ट प्रदर्शन से उत्साहित लोग सोशल मीडिया पर कुछ इस तरह की प्रतिक्रिया दे  रहे हैं. मनोबल बढ़ाने के उद्देश्य से कही गई ये बात तथ्यात्मक रूप से बिल्कुल सही है. लड़कियों के लिए हमारे समाज में जिस तरह का वातावरण मौजूद है, उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए कई सामंजस्य बैठाने पड़ते हैं. 'घर संभालने' की अदृश्य जिम्मेदारी का दबाव उनमें से एक है.


महिला हॉकी में भले ही कोई पदक  न मिल पाया हो लेकिन चौथे स्थान पर रहना भी आगे जीत की दस्तक देने के बराबर है  । महिला हॉकी टीम के लिए अनिता जी की रचना पढ़िए ---





महिला हॉकी


पायलों की रुनझुनों में,काल की टंकार हो तुम।
नीतियों की सत्यता में,स्वर्ण का आधार हो तुम।।


खेल से इतर कुछ गज़लों की बात हो जाय ..... बड़े धुरंधर ग़ज़लकारों की गज़लें हैं .... पढ़िए और दाद दीजिए ---
दिगंबर नासवा जी तो अभी बच्चा बन बाहों में इतरा ही रहे हैं और क्यों न इतरायें आखिर माँ की बाहों में होने का एहसास जो है-----



और बच्चा बन के मैं बाहों में इतराता रहा ...


सात घोड़ों में जुता सूरज सुबह आता रहा.
धूप का भर भर कसोरा सर पे बरसाता रहा.

काग़ज़ी फूलों पे तितली उड़ रही इस दौर में,
और भँवरा भी कमल से दूर मंडराता रहा.

और हर्ष महाजन जी न जाने किस गलतफहमी के शिकार हो गए हैं ----



गल्त-फ़हमी थीं बढीं अर फासले बढ़ते रहे,


गल्त-फ़हमी थीं बढीं अर फासले बढ़ते रहे,
हम मुहब्बत में हैं लेकिन दुश्मनी करते रहे |


अब गलतफहमी कुछ भी रही हो लेकिन ये कोरोनकाल ने सोच को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है । पढ़िए मुकेश सिन्हा जी की कोरोना से जुड़ी क्षणिकाएँ ----



 कोरोना से जुड़ी हुई


🔴 आइसोलेशन

इतने स्ट्रिक्ट लॉक डाउन और 
आइसोलेशन के बावजूदन 
जाने किन गलियों से गुजरकर
तुम आ ही जाती हो
मेरे दिल के अंदर


श्रावण मास में प्रकृति भी अजब गजब रंग दिखाती है । कहीं बिल्कुल सूखा तो कहीं बाढ़ ले आती है । इसी दृश्य को शब्दचित्र में बांधा है जिज्ञासा जी ने कि --



नदी सहारा ढूँढ रही (बाढ़ )


भर भर भर भर कटे कटान
गिरे जा रहे बने मकान
नागिन जैसी फन फैलाए
अपना चौबारा सूंघ रही


चलते चलते एक गंभीर मुद्दे पर ध्यान आकर्षित  कराना  चाहूँगी ---- ये ऐसा मुद्दा जो हर एक को उद्वेलित कर देता है , सोचने पर मजबूर होते हैं कि आखिर इस समस्या का निदान क्या है ? " बलात्कार " विषय  पर अपने विचार रखे हैं मनीषा गोस्वामी ने .... बेबाक और निष्पक्ष लेखन है - आप भी अपने विचार रखें ---- 


मानवता की हदें पार करने वाले के लिए मानवता की बात क्यों?



बेटियाँ  कैसे सुरक्षित रहेगी जब तुमने अपने लाडलों  को घटिया हरकत करने की छूट दे रखी है?और बेटियों के पढ़ाई और बाहर जाने पर भी पाबंदी लगा रखी है ! महिलाएँ असुरक्षित है ,ये तो सब कहते है पर खतरा किससे है, ये बताने कि हिम्मत किसी में नही है !


आज बस इतना ही ..... मिलते हैं अगले सोमवार को ....
आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा .... 

संगीता स्वरूप ।




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