शीर्षक पंक्ति: आदरणीया अलकनंदा सिंह जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।
विशेष!
लीजिए आज प्रस्तुत है
कविवर शिवमंगल सिंह 'सुमन' जी की कविता 'चलना हमारा काम है' का अंश-
"साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
गति न जीवन की रूकी
जो गिर गए सो गिर गए
रहे हर दम,
उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है।"
-शिव मंगल सिंह 'सुमन'
आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
छलकी
तेरी गागर
जल से भरी
सर पर
धरी।
सपेरे,
तुम्हें लगता है
तुम साँप को नचा रहे हो,
पर ध्यान से देखो,
तुम उसे नहीं,
वह तुम्हें नचा रहा है.
पगुराना वो सीख गईं
दूध की नदियाँ सूख गईं
लिए कमंडल खड़े हुए हम
लेरुआ की मिट भूख गई
थैला बोतल बिके धकाधक
पड़रू दूध विहीन।।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव





