सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक
में
आपका
स्वागत
है।
आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-
ये चलते हैं
जिह्वा की कमान से
और जब चलते हैं
रक्त की एक बूँद भी
दिखाई नहीं देती
लेकिन मन प्राण आत्मा को
निमिष मात्र में घायल कर
निर्जीव बना जाते हैं !
संग्राम है जीवन अगर
लड़ना ही होगा मगर
जीत तक लड़ते रहेंगे
क्यों पराजय की कहेंगे।।
अंजान रिश्ते...पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा
कल, पल न बन जाए भारी!
यूँ, निभा न यारी!
न कर, उन अनाम रिश्तों की सवारी,
कल, कौन दे, तुझको यूँ ढ़ाढ़स,
न यूँ, बेकल पल बिता,
यूँ न गढ़, व्यथा की अन्तःकथा तू!
साँसों पे
तलवारें लटकी
है
आँखें धड़कन
पर
अटकी
है
हम रोएँ
या
फिर
सिर
पटके
जीवन की
राहें
भटकी
है।
मैं तुम्हारे कारण यहां हूं और तुम मेरे कारण यहां हो ~ मुल्ला नसरुद्दीन प्रस्तुति :रिंकी राउत
मुल्ला तो बहुत डर गया। बारात के लोग उसके चारों तरफ इकट्ठे हो गए और उन्होंने पूछा: ‘तुम यहां क्या कर रहे हो? इस कब्र में क्यों पड़े हो?’ मुल्ला ने कहा: ‘तुम बहुत कठिन सवाल पूछ रहे हो। मैं तुम्हारे कारण यहां हूं और तुम मेरे कारण यहां हो।’