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गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

2036...कुछ देर जागकर हम आज भी सो रहे हैं...

सादर अभिवादन। 

गुरुवारीय अंक में आपका स्वागत है। 

धरती के आभूषण 

बर्फ़ पर्वत पहाड़ नदियाँ

आजकल विद्रोही हो रहे हैं, 

क़ुदरत की परवाह के प्रश्न पर

कुछ देर जागकर  

हम आज भी सो रहे हैं। 

#रवीन्द्र_सिंह_यादव   

आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

अंधविश्वास पच्चीसी - भाग 1... प्रोफ़ेसर गोपेश मोहन जैसवाल 

 

अशिक्षित स्त्रियों में अंधविश्वास का बहुत अधिक प्रसार होता है.

जादूकाला जादूगण्डेताबीज़टोटकानज़र लगनाजिन्नभूतचुड़ैलमन्नत और जाने किस-किस में ये विश्वास करती हैं.

स्त्री-समाज में तो अंधविश्वासों का बोलबाला कुछ ज़्यादा ही था.

अंधविश्वास के उन्मूलन के लिए स्त्री-शिक्षा का प्रसार अत्यन्त आवश्यक है.


अग्नि परीक्षा...आशा लता सक्सेना 


सतयुग में सीता ने दी थी अग्निपरीक्षा

अपनी  पवित्रता के  प्रमाण के लिए

 भूल हुई  थी उनसे लक्ष्मण रेखा पार  कर

यदि कहना माना होता इतने कष्ट सहना होते

राम रावण युद्ध होता |

मैं जान जाती हूँ... साधना वैद 


जब चाँद सितारे आसमान में

एकदम मौन स्तब्ध अपने स्थान पर

रत्न की तरह जड़े से दिखाई देते हैं,

जब पास से आती पत्तों की

धीमी सी सरसराहट भी

अनायास ही बेचैन कर जाती है

मैं जान जाती हूँ

नींद तेरी आँखों से कोसों दूर है !

क्षणिकाएँ... मीना भारद्वाज 

 
देख कर भी किसी की

अनदेखी करना

भले ही

किसी की नजरों में

सभ्यता का दायरा होगा

छलना को तो यह...

अपना कौशल ही लगता है

रिश्ते यहाँ अक़्सर...सुबोध सिन्हा 

बनते हैं रिश्ते

ऐसे में या ..

होता है फिर

कुलीन-शालीन

व्यापार कोई ?

वर्तमान...अनीता सैनी 'दीप्ति'

बसंत में पल्लवित पौधे को 

बुहार अग्नि पुष्प खिलाए 

नदियों को तितर-बितर कर 

साज़िश से समंदर को सुखाया।

*****

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगले गुरुवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


 

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