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गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

1742...आलथी-पालथी मारकर आ बैठा सामने वायरस करोना...

सादर अभिवादन। 

आलथी-पालथी 
मारकर 
आ बैठा सामने 
वायरस करोना,
त्रिस्तरीय वस्त्र से 
ढको चेहरा
शारीरिक दूरी का 
रहे ख़याल  
कुछ छुओ तो 
हाथों को 
हर बार धोना
भागेगा करोना। 
-रवीन्द्र 
आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-  

 

रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी
और फूल-फलकर मैं मोटा सेठ बनूँगा
पर बंजर धरती में एक अंकुर फूटा
बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला

  
ग़मज़दा काटों ने हँस कर फूल से कहा !
रश्क करते करते  मैं  जर्जर हो गया हूँ!!

संस्कारों की बात पूछने जाउँ कहाँ नये दौर में!
संश्कारों का दहन देख कर शर्मसार हो गया हूँ!!

  
उफ कितना गन्दा हो गया
नदियों का पानी
आह, बढ़ गया फिर से 
प्रदूषण
अरे, गौरैया फिर हो गयीं
गायब
और फिर जुटेगी
विचारकों की भीड़
और प्रदूषित होगी 
वर्चुअल वाल
और चिरकाल तक
  

 

आछी के 
फूल जहाँ 
मेहँदी के पात हरे ,
हँसती है 
साँझ -भोर 
माँग में सिन्दूर भरे ,
आम और 
महुआ के 
फूलों के ठाँव चलें |
  
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आज जब हम घरों में बैठे हैं, पृथ्वी अपने को स्वच्छ कर रही है अर्थात पृथ्वी अपना दिवस स्वयं ही मना रही है. वेदों में पर्यावरण की सुरक्षा के लिए कितने ही मन्त्र गाये गए हैं. आज आवश्यकता है उन्हें फिर से दोहराने की, जिससे हमारा यह सुंदर ग्रह फिर से अपनी खोयी हुई शांति और सुंदरता को प्राप्त कर सके. हरे-भरे जंगल, उनमें विचरते हुए निःशंक प्राणी और प्रकृति का संरक्षण करता हुआ मानव समाज फिर से अस्तित्त्व में सके


हम-क़दम का नया विषय

यहाँ देखिए

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 



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