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बुधवार, 18 मार्च 2020

1706...मैं दैर-ओ-हरम का पता चाहता हूँ ..

।। उषा स्वस्ति ।।
"रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!"
हरिवंशराय बच्चन
वैश्विक स्तर पर फैलती जा रही महामारी (कोरोना) से निपटने के लिए अनुशासित जीवनशैली के साथ अत्यधिक जागरूक करने की आवश्यकता है...क्योंकि 
यथार्थ में हम बहुत कुछ गवां बैठे है..किंतु प्राची से उषा की आभा के साथ नज़र डालें प्रस्तुत लिंकों पर...✍
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हर दर्द कुछ सिखाता है 
सोते को जगाता है,
अंतहीन मांगों पर 
अंकुश भी लगाता है !

कोरोना ने दी दस्तक 
घूँट कड़वे पिलाता है,
अति सूक्ष्म दुश्मन यह 
नजर नहीं आता है 
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कार के पहिए की गति के साथ ही आशा के विचार भी सफर करते हुए सात साल पीछे पहुंच चुके थे। शादी होकर जब वह घर आई थी सास और दोनों ननदों ने हाथों हाथ  स्वागत किया था।  छह महीने  हंसी-खुशी बीते फिर एक  दिन सास से हँसते हुए कहा ,"बहू अब बस एक पोता मेरी गोद में दे दो।" आशा शरमाती हुई धीरे से अपने कमरे में चली गई ।...
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 मिलावट -आज के युग में जहां देखा  वहीं है मिलावट
कोई नहीं बचा इसकी मार से
जहां जहां पड़े पैर शुद्धता के   
 मिलावट ने गर्दन पकड़ी पीछे से |
जब गेहूं लाए आटा पिसवाया
जल्दी में बीना नहीं  ठीक से
इतनी किसकिसाहट  आटे में थी
की वह कूड़ेदान के हुआ हवाले..

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सड़क तन्हाई की दौड़ आया 

शहर जिस पर तरक़्क़ी के शजर थे 
तेरी पगडंडियों से जोड़ आया 

किसी की सिसकियों का दर्द ले कर

⭕⭕

ये सब तेरे आंखों की गलती है और क्या है

जिसे चांद चंद्रमा चंदा मेहताब कहती है ये दुनिया
हर रात वही छत पर निकलती है और क्या है...

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रहे   तू   जहाँ   वो   फ़िज़ा  चाहता  हूँ ।
मैं दैर-ओ-हरम  का  पता  चाहता हूँ ।।1

तेरी  खुशबुओं  से   मुअत्तर  चमन  में ।
महकती   हुई   इक  सबा चाहता  हूँ ।।2
।।।।
हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए
।।।।।।
।। इति शम ।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ‘तृप्ति’..✍









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