।। भोर वंंदन ।।
वर्तमान परिपेक्ष्य को चरितार्थ करतें चंद शेर..
यहाँ पर नफ़रतों ने कैसे कैसे गुल खिलाये हैं
लुटी अस्मत बता देगी दुपट्टा बोल सकता है
बहुत सी कुर्सियाँ इस मुल्क में लाशों पे रखी हैं
ये वो सच है जिसे झूठे से झूठा बोल सकता है
सियासत की कसौटी पर परखिये मत वफ़ादारी
किसी दिन इंतक़ामन मेरा गुस्सा बोल सकता है
मुनव्वर राणा
आज के लिंकों में शामिल रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें..✍
आ० चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ जी,
आ० पल्लवी गोयल जी,
आ० कमल उपाध्याय जी,
आ० दिगंबर नासवा जी और
आ० अमित निश्छल जी
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है कोढ़ गर तो कोढ़ के छाले न जाएँगे
जो जो भी कारनामें हैं काले न जाएँगे
आएगा वक़्त जाने का जब मैक़दे से घर
हम कोई भी हों साथ ये प्याले न जाएँगे
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जब कहा हुआ
कहा जाएगा
और फिर
कहा जाएगा
और तब तक
के लिए छोड़
दिया जाएगा
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टिकोरी सरकार की नीतियों से खफा था। खफा होना भी चाहिए। प्रधानमंत्री साहब ने कहा था की जीतकर आएंगे और आते ही मंदिर बनवाएंगे और उससे पहले युवकों को रोजगार दिलवायेंगे। इसी चक्कर में टिकोरी उत्तम्मा -
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या शायद नहीं भी रुकता
पर मुझे याद है तुमने रोका नहीं था
(वैसे व्यक्तिगत अनुभव से देर बाद समझ आया,
माँ बाप बच्चों की उड़ान में रोड़ा नहीं डालते)..
जो यहाँ सद्भाव रखता, जीवनीभर मात खाता।।
उष्ट्र, निज पुरुषार्थ के बल, हो गया बंधक सदा को।
तेंदुओं के शीश मिलते, सिंधु वाली घाटियों से।।
दुश्मनी, वनराज को थी...
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍



