सादर अभिवादन
रक्षाबन्धन और स्वतंत्रता दिवस का
अभूतपूर्व संगम
73 वर्षों मे चौथी बार ऐसा अवसर आया है
सारे भाई - बहन भागा-दौड़ी में लगे रहे
हमारे चर्चाकार भी इनसे अलग नहीं है
आइए देखते हैं आज की मिली जुली रचनाएँ...
रक्षाबन्धन और स्वतंत्रता दिवस का
अभूतपूर्व संगम
73 वर्षों मे चौथी बार ऐसा अवसर आया है
सारे भाई - बहन भागा-दौड़ी में लगे रहे
हमारे चर्चाकार भी इनसे अलग नहीं है
आइए देखते हैं आज की मिली जुली रचनाएँ...
कश्मीरी लड़की... रवीन्द्र सिंह यादव
अपने देशवासियों पर भड़की हूँ।
मेरा रंग और बदन पसंद तुम्हें,
ये मनोविकार हैं नापसंद मुझे,
गुल बनो!
गुलफ़ाम को लेने,
आ जाना गुलशन में!
बदल सकोगे जलवायु?
जिसमें पलकर मैं बड़ी हुई
सुमन पाँख-सी कोमल हूँ

चलो न हम रंगें, ये जमीं, ये विश्व, ये आकाश,
अनूठे से, ये तीन रंग, हैं हमारे पास!
पर्वतों के शीष पर, हैं बिखेरे हमने रंग,
ये पहाड़ दुग्ध से, सदा ही हँसे हैं हमारे संग,
सन गए ये कभी, आतंक के खून संग,
खामोश से हुए, दुग्ध के आकाश!
चलो न हम रंगें, इस तिरंगे सा,

पिता
तब भी बूढ़ा नहीं होता अपने बच्चों की नजर में।
बच्चे उसे हमेशा समझते हैं जवान
मिल्खा सिंह की तरह तेज तर्रार धावक
मिल्खा सिंह आज भले ही हो गए हों बूढ़े
पर पिता मिल्खा सिंह आज भी जवान है, युवा है।

एकदम मूड ऑफ हो गया दी' ... अच्छा हुआ आप नहीं गईं ..."
वाणी - "हाँ रे ! ठीक ही कह रही है तू...अच्छा हुआ ये बीमार हो गए , इनके बहाने मैं घाटा से बच गई...अच्छा काट फोन, अब 'ये' जाग
गए हैं , बुला रहे... मैं जा रही ... सी यू ... टेक केअर "
शेफ़ाली-"सी यू ..दी '!कल सुबह और डिटेल में इनके मार्केट जाने के बाद बात करते हैं ...ठीक है ना !? ...टेक केअर दी'...जाओ जीजू का ख्याल रखो ...हाँ...."
उनकी क्या बात करें हम वफ़ा की महफ़िल में
हमको जो देख के दीपक ही बुझा देते हैं।
किसकी आंखों में समंदर की सी गहराई है
आज बस..
आज्ञा दें
सादर
आज्ञा दें
सादर

