ना हम बदलने वाले और ना समाज में बदलाव होगा
क्यों लेखन के लिंक्स का हम प्रचार कर रहे हैं
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10214768315143020&id=1279375656
https://www.facebook.com/100001998223696/posts/2274349129308339/
अब बारी है विषय की
चौहत्तरवें अंक का विषय
विषय
उजाला
उदाहरण..न कोई मीत मिले तो फ़क़ीरी कर ले जलती शमा को बुझा के जुदाई सह ले मिलती नहीं खुशियाँ तन्हाई जब होती स्याह रातों में ग़मों से फिर दोस्ती कर ले लोग ऐसे भी हैं उजाले में नहीं दिखते आज़माएँ उनको भी ग़र अँधेरा कर ले रचनाकार-श्री शशि गुप्त शशि
हमेशा संकुचा जाते लहर संताप



