।।प्रात:वंदन।।
"बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो
ऐ काश हमारी आँखों का इक्कीसवाँ ख़्वाब तो अच्छा हो"
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर..
(23/4/19)
अब नज़र डालें आज की पेशकश पर.
.जिनमें रचनाकारों,ब्लॉग के नाम क्रमानुसार है..
काव्य धारा,
दिलबाग सिंह 'विर्क'जी,
सरोकारनामा,
जज़्बात,
दिगंबर नासवा जी..✍
बड़ी हसरत से तकती है
महीनों अब मुलाक़ातें नही होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थी
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के परदे पर
बड़ी बैचेन रहती है किताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
जो ग़ज़लें वो सुनाती थी कि जिनके शल कभी गिरते नही थे
जो रिश्तें वो सुनाती थी वो सारे उधड़े-उधड़े है
कोई सफ़्हा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है..
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वाह-रे-वाह मेरी तक़दीर, तू भी ख़ूब रही।
हालातों को बदलने की कोशिशें करता रहा
हर बार हारा मैं, हर बार हाथ आई बेबसी।
कभी किसी नतीजे पर पहुँचा गया न मुझसे
अक्सर सोचता रहा, कहाँ ग़लत था, कहाँ सही।
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आज़म खान ने पहले जयाप्रदा की चड्ढी का खाकी रंग बताया था। चुनाव आयोग से माफ़ी मांगने और बैन भुगतने के बाद अब जयाप्रदा को आम्रपाली कह दिया है। आम्रपाली मतलब नगर वधू । नगर वधू मतलब तवायफ़। वेश्या। बाप तो बाप बेटा सुभान अल्ला।
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पहचान कर
बयान देकर वापस लेने के ट्रेंड को
माँ-बहन की अनगिनत गालियाँ
दे डाली मैंने अपने फ्रेंड को
सोचा था मैं उसको
सरप्राईज दूंगा
बाद में अपनी गालियाँ
वापस ले लूंगा,
गालियाँ सुनकर
उसका ब्लडप्रेशर बढ़ गया
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कभी वो भूल से आए कभी बहाने से
मुझे तो फर्क पड़ा बस किसी के आने से
नहीं ये काम करेगा कभी उठाने से
ये सो रहा है अभी तक किसी बहाने से
लिखे थे पर न तुझे भेज ही सका अब-तक
मेरी दराज़ में कुछ ख़त पड़े पुराने से
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हम-क़दम का नया विषय
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।।इति शम।।
धन्यवाद



