सादर अभिवादन।
पिछले 6 दशक से अधिक समय से हिंदी साहित्य में समालोचना के केन्द्र बिंदु रहे प्रख्यात साहित्यकार एवं शिक्षाविद आदरणीय डॉ. नामवर सिंह जी का कल निधन हो गया। उनका दूसरी दुनिया में चले जाना हिंदी साहित्य जगत् को अपूर्णनीय क्षति है।
आपका जन्म 28 जुलाई 1926 को बनारस के जीयनपुर गाँव में हुआ था।
आपका जन्म 28 जुलाई 1926 को बनारस के जीयनपुर गाँव में हुआ था।
93 वर्ष की आयु में कल नई दिल्ली के
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में
उन्होंने अंतिम साँस ली।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में
उन्होंने अंतिम साँस ली।
संवेदना को अपने प्रगतिशील चिंतन में उन्होंने
शिखर पर पहुँचाया।उनके द्वारा रचा गया साहित्य हमें दिशा दिखाता रहेगा। शब्द को गरिमा प्रदान करने वाला उनका व्यक्तित्व बेहद आकर्षक रहा।
शिखर पर पहुँचाया।उनके द्वारा रचा गया साहित्य हमें दिशा दिखाता रहेगा। शब्द को गरिमा प्रदान करने वाला उनका व्यक्तित्व बेहद आकर्षक रहा।
"पाँच लिंकों का आनन्द" परिवार डॉ. नामवर सिंह जी को भावभीनी श्रद्धाँजलि अर्पित करता है।
आइये अब आपको आज की चुनिंदा रचनाओं की ओर ले चलें-

प्रेम, अहिंसा, ज्ञान हमारी पूँजी है
जो भी हमसे मांगोगे हम दे देंगे
मगर तोड़ने वालों इतना सुन लेना
अपने माथे का चंदन हम ले लेंगे
काश्मीर तो देश का सुन्दर गहना है
सबको बच कर रहना है ...

कर्म पथ को सींचती
सुख़ वैभव परित्याग
पत्थर से भी प्रीत करें
करुणा ह्रदय का अनुराग |

अब मचलकर, बोल उठे वो गूंगे स्वर,
सँवर कर, डोल रहे वो गूंगे स्वर,
झरने सी, कल-कल बहती मन पर,
स्वर ने था, जीवन को जाना,
जीवन्त हो चली , साधारण सी रचना!

अब खड़ा ठूंठ बनकर
मिटने वाला है मेरा वजूद
यादें अतीत की सताती
हवाएं भी नहीं सहलाती
भूले से भी नहीं बैठते पंछी
सिर्फ जरूरतमंद पास आते
तोड़ डालियां चूल्हे जलाते
सबको मेरे गिरने का इंतजार
सूखा वृक्ष हूंँ मैं बिल्कुल बेकार

खोया कहां हुंकार है
क्या भूल है क्या विकार है
क्यों हार ये स्वीकार है.
दुष्कर्म का ही प्रचार है
साक्षी सकल संसार है
उपचार हो ये पुकार है
करना नहीं उपकार है.
चलते-चलते "उलूक टाइम्स" से कुछ तीखी-मीठी सीधी-उलझी सार्थक बातें-

दो हजार
उन्नीस पर
नजर गड़ाये
हुऐ हैं सारे तीरंदाज
बिना
धनुष तीर के
अर्जुन ने लगाना
निशान आँख पर
हम-क़दम का नया विषय
आज बस यहीं तक।
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार।
रवीन्द्र सिंह यादव


