।।भोर वंदन।।
तेरह सौ अंक हो गए आज तक..
यानि हम चौथे वर्ष की ओर चल पड़े हैं
....
तेरह सौ अंक हो गए आज तक..
यानि हम चौथे वर्ष की ओर चल पड़े हैं
....
जागो फिर एक बार!
प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें
अरुण-पंख तरुण-किरण
खड़ी खोलती है द्वार
जागो फिर एक बार!
आँखे अलियों-सी
किस मधु की गलियों में फँसी
बन्द कर पाँखें
पी रही हैं मधु मौन
अथवा सोयी कमल-कोरकों में?
बन्द हो रहा गुंजार
जागो फिर एक बार!
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
🏝
दिन की शुरुआत नवउजास
के साथ ..निगाह डाले आज की लिंकों पर..✍
ब्लॉग स्वप्न मेरे की भावपूर्ण ग़ज़ल
यही ज़मीन, यही आसमां, यही सच है
यहीं है स्वर्ग, यहीं नर्क, ज़िन्दगी सच है
हसीन शाम के बादल का सुरमई मंज़र
हथेलियों पे सजी रात की कली सच है..
🏝
क्या अब अर्थी से मीत ,कफ़न उतारे जायेंगे ?
पारलोक गमन के बाद भी रगाँधी मारे जायेगे ?
अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान आजादी करती है..
🏝
मैं ख़ुदा से खफ़ा नहीं होता
ये जो कंधे नहीं तुझे मिलते
तू तो इतना बड़ा नहीं होता
चाँद मिलता न राह में उस रोज
🏝
ब्लॉग विश्वमोहन उवाच ..मौन !
जगा सरकता मैं सपनो में ।
डगर डगर पर जीवन पथ के
छला गया मैं बस अपनो से ।
भ्रम विश्व में, मैं माया जीव!
अपने कौन, बेगाने कौन?..
🏝
बरस गया सावन तो क्या है, मन का आँगन प्यासा है।
एक बार फिर तुम मिल जाओ, केवल यह अभिलाषा है।
अपनी अपनी राह चलें हम,
शायद नियति हमारी होगी।
मिल कर दूर सदा को होना,..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह'तृप्ति'..✍



