और गणतंत्र दिवस कल हम
हर्षोल्लास से मनायेंगे।
हर्षोल्लास से मनायेंगे।
सबसे ज्यादा उत्साहित
बुद्धिजीवी वर्ग
एक बार फिर से बुराइयों का पिटारा
खोलकर अपनी बौद्धिक क्षमता का प्रयोग करेगा।
चलिए मान लिया लाख़
बुराइयाँ है हमारे देश में,
गरीबी,भुखमरी,बेगारी,भ्रष्टाचार, घूसखोरी,
बेईमानी,नारी के प्रति असम्मान राजनीतिक अराजकता
और भी अनगिनत।
और भी अनगिनत।
पर सिवाय असंतोष गिनवाने और अपने अधिकार बखानने के
हम कितने अपने कर्तव्य के प्रति सचेत हैंं
यह सोचना भी जरूरी है।
★★★★★
चलिए आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं....शशि गुप्त

ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झनकार
ये इसमत के सौदे, ये सौदों पे तकरार
ये कूचे, ये नीलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं..
चांद का सम्मोहन...कुसुम कोठारी

प्राचीर से उतर चंचल उर्मियाँ
आंगन में अठखेलियाँ कर रही थी
और मैं बैठी कृत्रिम प्रकाश में
चाँद पर कविता लिख रही थी
मन में प्रतिकार उठ रहा था
उठ के वातायन खोल दूं
कैसे कह दूँ ?...मीना भारद्वाज

बीते लम्हों के हर पल से,
यादों के जुड़े हैं तार..,
कैसे कह दूँ ?
कुछ याद नही…..,
रेशम से उलझे रिश्तों में,
गाँठ लगी कई बार..,
कैसे कह दूँ ?
कुछ याद नही……,
आदरणीय प्रकाश साह जी
उसकी ओर बह जाते हैं

उसकी चुलबुली आँखें
उसमें मैं खो जाता हूँ।
जान-ए-जाँ ! मुझे माफ करना....
तुम्हें मैं भूल जाता हूँ।
मैं तो बस उसका...
दो पल ही ख्याल रखता हूँ।
घर जलाए लोगों ने करके नफ़रत.... दिलबाग सिंह विर्क

ऐ दिल न डर बेमतलब, दिखा थोड़ी हिम्मत
इश्क़ किया जिसने, वही जाने इसकी लज़्ज़त।
वो सहमे-सहमे से हैं और हम बेचैन
देखो, कैसे होगा अब इजहारे-मुहब्बत।
ए रात तुझे मैं क्या लिखूँ ....आँचल पाण्डेय
अंत लिखूँ या आगाज़
आज लिखूँ या कल लिखूँ
या लिखूँ दोनों का परवान
तुझे द्योतक अंधकार का लिखूँ
या लिखूँ नवल प्रभात का दूत
तुझे जोगन का जाप लिखूँ
******
आज का यह अंक आपको
कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं
की प्रतीक्षा रहती है।
कल का अंक पढ़ना न भूले
विभा दी लेकर आ रही हैं
विशेष प्रस्तुति
हमक़दम का विषय के लिए
यहाँ देखिए
आज के लिए मुझे आज्ञा दें।
-श्वेता सिन्हा
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं....शशि गुप्त

ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झनकार
ये इसमत के सौदे, ये सौदों पे तकरार
ये कूचे, ये नीलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं..
चांद का सम्मोहन...कुसुम कोठारी

प्राचीर से उतर चंचल उर्मियाँ
आंगन में अठखेलियाँ कर रही थी
और मैं बैठी कृत्रिम प्रकाश में
चाँद पर कविता लिख रही थी
मन में प्रतिकार उठ रहा था
उठ के वातायन खोल दूं
कैसे कह दूँ ?...मीना भारद्वाज

बीते लम्हों के हर पल से,
यादों के जुड़े हैं तार..,
कैसे कह दूँ ?
कुछ याद नही…..,
रेशम से उलझे रिश्तों में,
गाँठ लगी कई बार..,
कैसे कह दूँ ?
कुछ याद नही……,
आदरणीय प्रकाश साह जी
उसकी ओर बह जाते हैं

उसकी चुलबुली आँखें
उसमें मैं खो जाता हूँ।
जान-ए-जाँ ! मुझे माफ करना....
तुम्हें मैं भूल जाता हूँ।
मैं तो बस उसका...
दो पल ही ख्याल रखता हूँ।
घर जलाए लोगों ने करके नफ़रत.... दिलबाग सिंह विर्क

ऐ दिल न डर बेमतलब, दिखा थोड़ी हिम्मत
इश्क़ किया जिसने, वही जाने इसकी लज़्ज़त।
वो सहमे-सहमे से हैं और हम बेचैन
देखो, कैसे होगा अब इजहारे-मुहब्बत।
ए रात तुझे मैं क्या लिखूँ ....आँचल पाण्डेय
अंत लिखूँ या आगाज़
आज लिखूँ या कल लिखूँ
या लिखूँ दोनों का परवान
तुझे द्योतक अंधकार का लिखूँ
या लिखूँ नवल प्रभात का दूत
तुझे जोगन का जाप लिखूँ
******
आज का यह अंक आपको
कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं
की प्रतीक्षा रहती है।
कल का अंक पढ़ना न भूले
विभा दी लेकर आ रही हैं
विशेष प्रस्तुति
हमक़दम का विषय के लिए
यहाँ देखिए
आज के लिए मुझे आज्ञा दें।
-श्वेता सिन्हा
