ईवीएम का द्वंद्व
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छल
है?
आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

न जाने कौन सा आसेब दिल में बस्ता है,
कि जो भी ठहरा वो आख़िर मकान छोड़ गया।
अक़ब में गहरा समुंदर है सामने जंगल,
किस इंतिहा पे मेरा मेहरबान छोड़ गया।

इसी बीच रुदन का एक तीव्र स्वर उभरता है और
मेरी तंद्रा भंग होती है. लोगों के आने का क्रम जारी है. बांस की खपाची से बनी
शायिका पर उन्हें लिटा दिया गया है. ऊपर से एकरंगा का ओहार भी तान दिया गया है.
उनके निष्प्राण किन्तु प्रदीप्त मुखमंडल पर फूलों के पराग भी निश्चेत लुढ़के हुए
हैं और मेरी निश्चेष्ट आँखें एक बार फिर बड़का मामा की धराशायी देह में डूबती अतीत
की गहराई में उतर जाती हैं.....

न सुनाओ अखबार की खबरे कि
यहाँ बलात्कार, वहाँ कत्ल सरेआम हुआ.

आज की नारी यह मानती है कि वास्तव में कोई मालिक नहीं और कोई ग़ुलाम नहीं। खत के अंत में यह लिखने की जरुरत नहीं है कि "तुम्हारी दासी"! आज की नारी, प्रेमचंद की ऐसी पात्रा नहीं है जो अपनी इच्छाओं का दमन करती हुई, चुपचाप सारे अन्याय सहती रहे।
21वीं सदी और ये वाक्य पढ़े लिखे लोग इनके पिता जिन्होंने संस्कृत और हिंदी में स्नातकोत्तर किया है और ये शब्द उनके मुंह से..
विस्मय नही मेरे चेहरे पर हृदय पर एक गहरी चोट लगी इसलिए नही मैं दोषारोपित हुई,अपितु इसलिए कि मेरी दादी की जीवनी उनकी दादी की सबके बहूओं की जीवनी,सबकी यही कहानी थी,और इतने सदियों बाद आज मेरी भी।
विस्मय नही मेरे चेहरे पर हृदय पर एक गहरी चोट लगी इसलिए नही मैं दोषारोपित हुई,अपितु इसलिए कि मेरी दादी की जीवनी उनकी दादी की सबके बहूओं की जीवनी,सबकी यही कहानी थी,और इतने सदियों बाद आज मेरी भी।
यहाँ देखिए
आज के लिये बस इतना ही
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार।
रवीन्द्र सिंह यादव