सादर अभिवादन।
हैं
ख़ुश
क़दम
रखकर
नये साल में
तीसरा दिन है
ख़ुशी हर हाल में।

इक नयी उम्मीद का, सपना
संजोए आ रहा हूँ,
दर्द का एहसास है, फिर
भी तराने गा रहा हूँ.
आज अपने हाथ से, तकदीर
लिखने जा रहा हूँ.
मैं कब कहता हूँ.......बशीर बद्र

मैं हर लम्हे मे सदियाँ देखता हूँ
तुम्हारे साथ एक लम्हा बहुत है
मेरा दिल बारिशों मे फूल जैसा
ये बच्चा रात मे रोता बहुत है
जीवन अनसुलझी पहेली….कुसुम कोठारी
जर्द पत्तों का शाख से बिछड़ना
तिनके के नशेमनो का उजडना।
ख्वाहिशों का रोज सजना बिखरना
सदियों से चला आ रहा ये सितम।

तलबपरस्त दुनिया में मक्कारी है, गद्दारी है
रिश्तों में कुछ भी ऐसा नहीं, जिसे वफ़ा कहें।
ज़मीं पर हो गई है, ख़ुदाओं की भरमार
ऐ ख़ुदा ! बता तो सही, अब तुझे क्या कहें।
बच्चे
नंगे ही
भले-चंगे लगते है
गरीब के

