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शनिवार, 22 दिसंबर 2018

1254... कच्चे


कमाल करते हैं हमसे जलन रखने वाले भी
महफ़िले खुद की सजाते हैं और चर्चे हमारे करते हैं...

सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
हमारी तारीफ हो
सब हाँ-में-हाँ मिलाएं
बस शहंशाह तो हमीं ठहरे
तड़प-तड़प कर जल रहे ,
जैसे
कोयला जल रहा
खुद को भस्म कर रहा
और
तपिश सबके लिए भर रहा..
Image result for कच्चे पर कविता
कच्चे
वादियों से सिला रुस्तम कोहरा
धीमी-धीमी, धुंधली-धुंधली
ठहरा हुआ, सिमटा-सिमटा ये समा
रुके क्यों, क्यों थमे
थामे हाथों में हाथ, उगे

मलमल कच्चे रंगों की
यूं लग रहा है जैसे जहन्नम है ज़िन्दगी
बरहम हैं आप मुझसे तो बरहम है ज़िन्दगी

इस ज़िन्दगी का क़र्ज़ चुकाने के वास्ते
सौ साल भी जियें तो बहुत कम है ज़िन्दगी

लिक्खा हुआ है एक फटी ओढ़नी पे ये
हारे हुए कबीले का परचम है ज़िन्दगी

कच्ची माटी
दर्द की ‘धुप’ कहाँ अनुभव की है ?
अभी कहाँ इन ,’तृष्णाओंने’,
सोच तुम्हारी, परखी है।
अभी बरसती तुम पर ममता ,
कहाँ सही तूने गर्मी !
नही तपे तुम, अभी आग में
कुंदन होना बाकि है।

कच्ची कविता

अखबार पर दाल चावल खाने वाला भी गुनगुनाता है अपने दर्द को,
और किसी बार से झूमकर निकलता शराबी भी स्वर देता है अपने स्वप्न को।
उतारता नही अपना यह दर्द और अपना स्वप्न वह किसी कागज पर
क्युंकि डरता है कि उसके पास बस दर्द और स्वप्न ही हैं


फिर मिलेंगे...

अब बारी है हम-क़दम की
पचासवाँ अंक
विषय
उदाहरण
नाज़ुक सी डोर से जुड़े ये दिल, 
लेकिन आस-पास के कंटीले बाड़ों से 

लड़ती उनकी ये मोहब्बत... 
उनके होठों पर एक कच्ची सी मुस्कान लाने के लिए 
दुनिया भर से नफरत मोल लेती ये मोहब्बत...

अंतिम तिथिः 22 दिसम्बर 2018
प्रकाशन तिथिः 24 दिसम्बर 2018

प्रविष्टि प्रारूप पर ही स्वीकार्य
धन्यवाद।

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