।।भादवी सुप्रभात।।
हम ऐसी सब किताबें क़ाबिले ज़ब्ती
समझते है,कि जिनको पढ के
बच्चे बाप को ख़ब्ती समझते हैं।
अकबर इलाहाबादी
कुछ इस तरह की साफगोई सोच के साथ लिंकों की ओर नज़र डालते हैं...✍
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फकीर की फकीरी का कीमतें-बाजार क्या है?
बदलने से जुब्बा-ओ दस्तार ख्यालात नहीं बदलते,
मसनद मिले भी तो क्या हालात नहीं बदलते /
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जैसे सर्दी की कुनमुनाती धूप
खिल उठो जैसे खिलता है जंगली गुलाब
पथरीली जमीन..
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समलैंगिक प्रेम
बड़ा अजीब है प्रेम,
किसी को भी हो जाता है,
लड़की को लड़की से,
लड़के को लड़के से भी,
समलैंगिक प्रेम खड़ा है कटघरे में,
अपराध है सभ्य समाज में,..
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कितना कुछ रह जाता है
छूट जाता है
और गुज़र भी रहा है
पीछे
न भरने वाले खड्ड मे समाता हुआ,
एक अंतहीन खड्ड
अंतहीन स्थान के साथ ..
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और अंत करती हूँ
आदरणीय ज़फर जी की गजल से..
तू एक बार गले लगा के देख ले...
कितने बंदर हमने संसद पिछले सालों में भेजे हैं
एक बार सदन में डमरू बजा के देख ले,
तेरे कदमो में तमाम उम्र की गुलामी रख दी हैं
जरा मुझे घूंघट उठा के देख ले,
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ती'..✍




