चिंतन किसी भी मनुष्य के अंतर में निहित स्वाभाविक गुण है।
चिंतन व्यक्तित्व निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। चिंतन
ही व्यक्ति के चरित्र और स्वभाव को प्रखरता प्रदान करता है।
चिंतन व्यक्तित्व निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। चिंतन
ही व्यक्ति के चरित्र और स्वभाव को प्रखरता प्रदान करता है।
हम हिंदी दिवस पखवाड़ा मना रहे हैंं। जोर-शोर से हिंदी साहित्य के
उत्थान के लिए नारे लगा रहे हैं। पर फिर भी हिंदी की परिस्थिति
में कोई विशेष अंतर नहीं हुआ है,उसके पीछे एक कारण हमारे
विचारों में मौलिक चिंतन का अभाव है। दूसरों के विचारों और
रचनाओं से प्रभावित हिंदी की रचनाएँ वर्तमान दौर में अपना
प्रभाव खोती जा रही है। मौलिक चिंतन का अभाव होता जा रहा है जो कि हिंदी के जीवन के लिए घातक रोग है।
उत्थान के लिए नारे लगा रहे हैं। पर फिर भी हिंदी की परिस्थिति
में कोई विशेष अंतर नहीं हुआ है,उसके पीछे एक कारण हमारे
विचारों में मौलिक चिंतन का अभाव है। दूसरों के विचारों और
रचनाओं से प्रभावित हिंदी की रचनाएँ वर्तमान दौर में अपना
प्रभाव खोती जा रही है। मौलिक चिंतन का अभाव होता जा रहा है जो कि हिंदी के जीवन के लिए घातक रोग है।
प्रत्येक मनुष्य अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखता है। अपने जीवन को
जीने के लिए मनमाना ढंग और मापदंड स्थापित करता है तो
फिर लेखन के संबंध में ऐसे मौलिक मापदंड क्यूँ स्थापित
नहीं किये जा सकते?
जीने के लिए मनमाना ढंग और मापदंड स्थापित करता है तो
फिर लेखन के संबंध में ऐसे मौलिक मापदंड क्यूँ स्थापित
नहीं किये जा सकते?
★★★
सादर नमस्कार
चलिए आज की रचनाएँ पढ़ते है-
★
आदरणीय विश्वमोहन जी की
लिखी एक विचारणीय रचना
लिखी एक विचारणीय रचना
छंद किसी का,
बंध है मेरा.
'प्लेगरिज्म'
'पायरेसी' का फेरा.
चौर-चातुर्य,
रचना उद्योग.
पूरक, कुम्भक,
रेचक योग.
★★★★★
आदरणीय अमित निश्च्छल की अद्भुत अभिव्यक्ति
चलो, कहीं दूर चलते हैं, दूर..., बहुत दूर..., बहू...त दूर।
विहग-विहंगम नीड़ों में डेरा,
चुपके से चातक आए लुटेरा,
लूट चले मन को उड़ता कहीं,
चित्त में ख़्वाबों का बड़ा एक ढेला...
विहग-विहंगम नीड़ों में डेरा,
चुपके से चातक आए लुटेरा,
लूट चले मन को उड़ता कहीं,
चित्त में ख़्वाबों का बड़ा एक ढेला...
★★★★★
आदरणीय प्रशांत जी की लेखनी से प्रस्फुटित
हे परम शब्द,
मेरे शब्द को अपने में स्थायित्व प्रदान कर |
समाहित कर
कि मैं गिरूं ना|
मेरी चेतना को विस्तार दे
ताकि
जागृत कर सकूँ
उस परम पुंज को
जिससे सर्जित किया है तूने
★★★★★
आदरणीया मीना गुलयानी जी की सरल सहज अभिव्यक्ति
सूरज की रश्मियाँ ज्योत्स्ना लुटा रही थीं
हरे पत्तों पर ओस की बूँदे चमक रहीं थीं
शीतल सुगंधित बयार मन लुभा रही थी
पक्षियों का कलरव सौंदर्य बढ़ा रहा था
उनकी कतार गगन की ओर जा रही थी
हरे पत्तों पर ओस की बूँदे चमक रहीं थीं
शीतल सुगंधित बयार मन लुभा रही थी
पक्षियों का कलरव सौंदर्य बढ़ा रहा था
उनकी कतार गगन की ओर जा रही थी
★★★★★★
आदरणीय नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष जी की
प्रतिभाशालीलेखनी से पढ़िए बेहद लाज़वाब

प्रतिभाशालीलेखनी से पढ़िए बेहद लाज़वाब

अंधकार को दूर भगाता
एक इसी में वह सुख पाता
कांति पुंज का है वह रक्षक
ऐ ! सखि दीपक, ना सखि शिक्षक
जाति पाँत सब वही बनाये
झूठ साँच के जाल बिछाये
एक वही जो लेता देता
ऐ सखि ईश्वर ? नहि सखि नेता
एक इसी में वह सुख पाता
कांति पुंज का है वह रक्षक
ऐ ! सखि दीपक, ना सखि शिक्षक
जाति पाँत सब वही बनाये
झूठ साँच के जाल बिछाये
एक वही जो लेता देता
ऐ सखि ईश्वर ? नहि सखि नेता
★★★★★
और.चलते-चलते पढ़िए उलूकटाईम्स के पन्नों से
आदरणीय सुशील सर की
जानदार अभिव्यक्ति

गुरु
मिस्टर इण्डिया
बन कर ऊपर
कहीं गुड़
खा रहा होता है
चेलों
का रेला
वहीं
सीढ़ियाँ पकड़े
नीचे से
★★★★★
मिस्टर इण्डिया
बन कर ऊपर
कहीं गुड़
खा रहा होता है
चेलों
का रेला
वहीं
सीढ़ियाँ पकड़े
नीचे से
★★★★★
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आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
हमक़दम के विषय के संबंध में
आज के लिए आज्ञा दीजिए
आदरणीया विभा दी
कल का अंक हिन्दी दिवस पखवाड़े
के साथ... प्रस्तुत होंगी


