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गुरुवार, 9 अगस्त 2018

1119....तो घायल होकर कभी तूं नीड़ में लौट आता है...

सादर अभिवादन। 
सावन शिवरात्रि है आज। 
शिव जी के भक्त अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिये 
गंगा नदी से पात्रों में गंगाजल भरकर, काँवड़ में सजाकर कंधे पर रखकर; पैदल चलकर भक्ति-भाव व समर्पण के साथ अपने-अपने गंतव्य पर पहुँचकर शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं। ऐसी मान्यता है कि सावन शिवरात्रि 
में शिव जी शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं।
              काँवड़ियों की यह यात्रा एक तपस्या की तरह होती है। मैंने इन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में काँवड़ कन्धे पर रखकर चलते हुए देखा है। 
कोई तो सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पैदल चलकर पूरी करते हैं। पैदल यात्रा की शुरुआत गंगातट से ही हो जाती है। इनके पैरों में जूते-चप्पल के अलावा कपड़े बंधे हुए भी दिखायी देते हैं कभी इन्हें नंगे पाँव चलते हुए भी देखा जा सकता है। अब इनमें  महिला काँवड़ियों को भी देखा जा सकता है। इन्हें शारीरिक कष्ट की कोई परवाह नहीं होती है। इनके सूजे हुए पाँव, तलवों में छाले आदि मैंने अक्सर देखे हैं।   
दिल्ली में काँवड़ियों की सेवा और सहायता के लिये सड़कों पर विशाल काँवड़ शिविर लगाये जाते हैं। 
काँवड़-यात्रा से अब अनेक विवाद भी जुड़ गये हैं जिन्हें हम इस दौरान देखते और पढ़ते रहते हैं। परसों दिल्ली के मोती नगर इलाक़े में किसी काँवड़िये की काँवड़ सड़क पर चलती एक कार से टकरा गयी तो काँवड़ियों ने अपना सारा ग़ुस्सा लाचार पुलिस के सामने कार पर उतारा। 
यह विचारणीय विषय है कि धार्मिक आयोजनों के प्रभाव में क़ानून हद तक लचर क्यों हो जाता है ?

आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलते हैं -          


कि मौन मुग्ध उजली वादियों में
सुदूर कहीं किसी छोर से हवा के पंखों पर सवार हो आती
अपने नाम की प्रतिध्वनि की गूँज मैं सुन लूँ
और वहीं पिघल कर धारा बन बह जाऊँ,
लेकिन ऐसा कभी हो नहीं पाता
और मैं अपनी अभिलाषा को कभी कुचल नहीं पाती ।

मेरी फ़ोटो

सामने से किसना दर्जी की भैंस रस्सी तुड़ा कर भागती हुई आ रही थी. भैंस माता के दर्शन कर भानू पंडितजी की बांछे खिल गईं. अब किसना दर्जी का उधार उसकी भैंस अपने घर बांधकर वसूल हो जाएगा. भूसन लुहार के घर कोई गाय-भैंस तो नहीं थी पर उसके औज़ारों को दूसरे लुहारों को बेचकर हज़ार -पाँच सौ तो इकट्ठे हो ही जाने थे. गांव के दो दर्जन मृतकों के अन्तिम संस्कार का जिम्मा भी तो पंडितजी को ही मिलना था. उसमें भी दान-पुण्य के रूप में उन्हें मोटी रकम हासिल होने वाली थी. अब तक दुखी भानू पंडितजी का चित्त गद्गद हो चुका था. उन्होंने श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़ कर इन्द्रदेव को उनकी महती कृपा के लिए धन्यवाद दिया.

रेवा दीदी....रेवा टिबड़ेवाल 



ये सिर्फ संबोधन
नहीं प्यार है
दीदी तुम माँ तो नहीं
पर उससे कम भी नहीं
जानती हूँ
मेरे दुःख में
 तुम्हारी आँखें भी भर

आती है





तो घायल होकर कभी तूं नीड़ में लौट आता है
फिर अगली उड़ान को तूं तैयार हो जाता है
कितने सुख और दुख कितने बांहों में भरता है
तेरे अंदर कर्ता के गुण तूं खुद भाग्य विधाता है।




राहत शिविर,रिरियाता बेबस
दानों को मोहताज़ कलपता
लाशों का व्यापार सीख कर

मददगार अपना घर भरता


आप सभी पढेंं और विचारों को अभिव्यक्त करें..
और देखें सप्ताह का विषय
यहाँ देखिए...........


आज के लिये इतना ही 
अब आज्ञा दीजिये।
कल की प्रस्तुति - आदरणीया श्वेता सिन्हा जी  

रवीन्द्र सिंह यादव 
                    
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