नमस्कार ! आज जब यह पोस्ट बना रही हूँ तो मन में चल रहा है कि कल शिक्षक दिवस है ......... सब ही इस दिवस से परिचित हैं ....... फिर भी संक्षेप में आप इस दिवस के बारे में इस पोस्ट पर जा कर पढ़ सकते हैं ....
शिक्षकों द्वारा किए गए श्रेष्ठ कार्यों का मूल्यांकन कर उन्हें सम्मानित करने का दिन है ‘शिक्षक दिवस‘। छात्र-छात्राओं के प्रति और अधिक उत्साह-उमंग से अध्यापन, शिक्षण और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संघर्ष के लिए उनके अंदर छिपी शक्तियों को जागृत करने का संकल्प-दिवस है ‘अध्यापक दिवस’।
अध्यापक दिवस के बारे में तो उचित जानकारी मिल गयी ........ लेकिन क्या अज कल ऐसे शिष्य कहीं मिलते हैं जो अपने गुरुओं से स्वयं के उत्थान के लिए प्रार्थना करें कि - हे ! गुरुवर , मुझे ज्ञान की गंगा में नहला दें ....... एक सुन्दर और भावपूर्ण याचना पढ़ें .....
तू भृंगी, मैं कीड़ा!
शिक्षक
गुरु का वंदन ( कुंडलियाँ )
थाम चला पतवार हाथ में
नौका पार लगाने को
ज्यों दीपक में जलती बाती
तम को दूर भगाने को।
आज शिक्षक दिवस के उपलक्ष में ये थीं शिक्षकों से सम्बंधित कुछ नयी पुरानी रचनाएँ ..... अब आपकी नज़र कर रही हूँ कुछ ताज़ातरीन रचनाएँ .........आइये आनंद लेते हैं आज की रचनाओं का .....
वैसे देखा गया है कि बहुत बार घर और बहुत बार बाहर भी स्त्रियों को आज़ादी से बोलने नहीं दिया जाता ,
अपने मन की बात वो नहीं कह पातीं ........ लेकिन भले ही कोई सुने या न सुने वो अपनी भड़ास निकाल तो लेती हैं ..... नहीं विश्वास ? ......... चलिए फिर पढ़िए इस रचना को .....
अफसोस
क्या पता कल फिर वक्त मिले न मिले
हो सकता है किसी को तुम्हारा इंतजार हो
हो सकता है तुमको किसी का इंतज़ार है
पर वक्त तो तुम्हारा इंतजार नहीं करता
अतिथि
भीख माँगती छोटी सी लड़की
हाथ फैलाए भीख माँगती....
आँखों में शर्मिंदगी,सकुचाहट लिए,
चेहरे पर उदासी ओढे......
ललचाई नजर से हमउम्र बच्चों को
सर से पैर तक निहारती.......
वह छोटी सी लड़की ,खिसियाती सी,
सबसे भीख माँगती.......
“क्षणिकाएँ”
भावनाएँ सोते सी
बहती बहती रूक जाती हैं
यकबयक..
बड़े ताकतवर हैं
अनचीन्हे अवरोध के पुल ।
गाँव को सब समझें - जाने,
अब मैं ऐसे दांव चलूँगा!
अब मन लगता नहीं शहर में,
अब मैं यारों गाँव चलूँगा!
मखमल जैसी हरी घास पर,
नंगे - नंगे पाँव चलूँगा!
गाँव के साथ ही बात प्रकृति की हो तो बात ही क्या ....क्यों कि जो थोड़ी बहुत हरियाली गाँव में मिलती है .... स्वच्छ हवा और झूमते वृक्ष दिखाई देते हैं वो शहर में कहाँ ? ..... तो आइये पढ़ते हैं एक ऐसी ही खूबसूरत रचना .....
प्रकृति के रूप
आसमान अब झुका धरा भरी उमंग से।
लो उठी अहा लहर मचल रही तरंग से।।
शुचि रजत बिछा हुआ यहाँ वहाँ सभी दिशा।
चाँदनी लगे टहल-टहल रही समंग से।।
प्रकृति के रूप के साथ ही आज इस प्रस्तुति को केवल काव्य रूप देते हुए समाप्त कर रही हूँ ........ अपवाद है कविता रावत जी का लेख ....... तो आप सब काव्यमय रहिये .... फिर मिलते हैं विभिन्न सूत्रों के साथ ......... तब तक के लिए विदा ......
नमस्कार .
संगीता स्वरुप .