शुक्रवारीय अंक में
बुद्धिरूपिणी देवी माँ सरस्वती को शत-शत नमन।
संपूर्ण प्रकृति उल्लासित और श्रृंगारित होने लगती है।
वृक्षों में नूतन किसलय,चित्ताकर्षक पुष्पों की सुवासित छटा,
आम्र मंजरियों से लदी अमराई में कोयल की कूक
एवं भ्रमरों के गान, सरस रागिनी प्रकृति सौंदर्य
को सुशोभित करते हैं, बसंती हवाओं की सुगंध कण-कण
में बिखर जाती है। हर्षित धरा का गान हृदय में
प्रेम और पवित्रता का संचार करते है। जग के झमेले
से हटकर अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ समय निकालकर
आप भी प्रकृति के उत्सव को महसूस कीजिए।
किसी पुराने स्वेटर की तरह है
जो अब पहना नहीं जाता
पर फेंका भी नहीं जाता
ठंड अचानक बढ़ जाए
तो वही
सबसे पहले याद आता है
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जय हो मातारानी की
जवाब देंहटाएंतुम्हारा प्यार पाकर माता,
जग में प्रज्ञा अभियान हो गया
आभार मातेश्वरी का
वंदन, अभिनंदन
सुंदर रचनाओं को समेटे सारवान सुंदर अंक प्रस्तुति । धन्यवाद !
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