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सोमवार, 12 जनवरी 2026

4620...खुशबुओं का ख़त लिए फिर भ्रमर बहकेंगे...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय जयकृष्ण राय तुषार जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

सोमवारीय अंक में आज पढ़िए ब्लॉगर डॉट कॉम पर प्रकाशित पाँच रचनाएँ-

नये साल की कविता

मिटे विषमता, हर भेद मिटे दुनिया से

हर इंसान, इंसान की क़ीमत जाने,

दिल की गहराई में झांक सके मानव

नहीं किसी को, कभी भी पराया माने!

*****

एक गीत -शाल ओढ़े धूप

कुछ दिनों के

बाद

पीले फूल महकेंगे,

खुशबुओं का

ख़त लिए

फिर भ्रमर बहकेंगे,

फिर यही

मौसम लगेगा

इस धरा का भूप.

*****

जगराता...

जाते-जाते उन्हें गाँधी मैदान के पश्चिमोत्तर छोर पर तथाकथित महात्मा गाँधी की मूर्ति के चबूतरे के पास कुछ लोगों की झुण्ड बैठी दिखाई दे रही है। वो लोग वहाँ ज़ोर-ज़ोर से बजाए जा रहे करताल और ढोलक की शोर से प्रतियोगिता करते हुए गला फाड़-फाड़ कर हनुमान चालीसा गा रहे हैं। उन सभी की मिलीजुली आवाज़ उन दोनों को विचलीत कर रही है- "जै जै हनुमान गोसाईं.. "-और केवल उन दोनों को ही नहीं वरन् गाँधी मैदान में सभी शांतिप्रिय टहलने वाले लोगों को भी और बैठ कर योग या ध्यान लगाने वाले लोगों के साथ-साथ सुबह-सवेरे पक्षियों के कलरव को भी। 

*****

शिव स्तुति-2

तू विषय विकार से है परे, तू विरक्त हो के शशक्त है
तू परोक्ष है, तू समक्ष है, तू ही सर्व लोक में व्यक्त है
तू ही निर्विकार तटस्थ है, तू ही सर्वगोचर भव्यतम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्

*****

पाठ

ट्रेन रुकी. बोर्डिंग स्कूल का स्टेशन था. प्लेटफॉर्म पर कदम रखते ही एक गंध ने घेर लिया; पसीना, फिनाइल, पुरानी किताबों की गंध. हॉस्टल की गंध. एक अजीब सी राहत मिली. यहाँ सब स्पष्ट था. नियम, पदानुक्रम, मजाक. यहाँ शगुन जैसे सवाल नहीं थे. यहाँ सब कुछ सतह पर था, और सतह पर ही निपट जाता था.

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 


4 टिप्‍पणियां:

  1. जी ! .. सुप्रभातम् सह मन से नमन आपको एवं हार्दिक आभार आपका .. हमारी बतकही को यह मंच प्रदान करने हेतु ...

    जवाब देंहटाएं
  2. यहाँ मेरे ब्लाग अनवरत को शामिल करने के लिए आभार.

    जवाब देंहटाएं

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