निवेदन।


फ़ॉलोअर

रविवार, 25 जनवरी 2026

4633 मजबूत मजबूर मशहूर और मगरूर किसका कौन सा दिन है

 सादर अभिवादन 
सप्ताह का एक दिन है, जो शनिवार के बाद और सोमवार से पहले आता है,   और यह सूर्य देव (सूर्य) को समर्पित एक शुभ और महत्वपूर्ण दिन है, 

भाई रवींद्र जी को आना था
खैर कोई बात नहीं
आप तो हैं..चलिए चलते हैं




आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती
ठूंठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती
लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज
प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  ।






सारा   बोझा   बंद   आँखों   में   उतारकर
झील   के    उस   किनारे   का   इंतजार
तरंग    उछलते   कंकड   ढूँढे    न    अब
कोई   प्रश्न   नाही   उत्तर   की    दरकार 
मेरा   होना   भी  एक   भूल   लागे   जब
नयन    समक्ष   दर्पण   मन   का   निहारे






सबसे पीड़ित व्यक्ति 
अपनी पीड़ा की बात नहीं सुनेगा 
उसके सामने दूसरे की पीड़ा को 
मनोरंजन बनाकर परोस दिया जायेगा  
वो अपनी भूखी अंतड़ियों को 
बांधकर
हिंसा के दृश्यों में उगाये गए 
आनंद के सागर में गोते लगाएगा।   





कूल-किनारे हरियाली हो ।
अन्तर कोश नहीं खाली हो ।
नदिया का अविरल प्रवाह ,
निर्मल , कल कल स्वर दे
मन जगमग जग करदे ।





गंगा!
यह तुम्हारी भाषा तो नहीं थी।

क्या कभी
तुम्हारे किनारों को
तख़्तियाँ थमाने वालों ने
उन नालों का हिसाब दिया—
जो तुम्हारे अस्तित्व को
गंदा करते हैं?

क्या कभी उन्होंने बताया
कि उन नालों में
किस-किस धर्म का
मल-मूत्र
तुम्हें सौंपा जा रहा है?
क्या जल भी
अब पहचान माँगता है?





मजबूरियाँ
मगर
नजर आई हैं
समझ में भी आई हैं

कुछ
करने के लिये
सच में
चाहिये होता है
एक बहुत बड़ा
विशाल कलेजा

वो कभी ना
हो पाया है
ना ही लगता है
कभी हो पायेगा
जो कर पाये
अपने आसपास
के झूठों से
सच में प्रतिकार  



आज बस
सादर वंदन

शनिवार, 24 जनवरी 2026

4632 ..सब तो हो ही रहा है न, अब भी तुम्हारे बिना भी

सादर अभिवादन 

लगभग एक महीने के अंतराल के बाद
सोच रहा था कोई चमत्कार होगा
वो आकर प्रस्तुति लगा जाएगा
पर जादू तो सिनेमा में ही होता है
यहां तो काम करना पड़ता है
चलो शुरू हो जाओ...


.... सब तो हो ही रहा है न अब भी
तुम्हारे बिना भी
नहीं रुकी है यह दुनिया किसी बिना भी
हमे ही यह अहम और वहम होता है 
कि हम ही हैं सब कुछ
दिया जाता है इतना दबाव, प्रभाव और तनाव
लगता है चौबीस घंटे हम न रहें तो सब थम जाएगा..
अपने आप पर ही आने लगता था गुस्सा
क्या जरूरत थी बीमार होने की
अब मन की सोच यही है कितना 
सारा सुकून खोया है मैंने
और बदले मे पाया बस एक वाक्य
"आपकी जगह कोई नहीं ले सकता"



बस तकलीफ मुझे हो रही थी, 
तुम्हें आराम जो देना था सो आपको
गया जी के गद्दे पर आसीन कराया और 
एक घड़ा जल प्रयागराज  
से लाकर आपके बगल में रखा
आराम से रहिए..




यह बेचैनी ऐसी है
कि इससे पार निकलना आसान नहीं।
यह खुद बेचैनी का शहर है।
यह बगुलों का शहर है।

यहाँ शक पर शक छाया है,
यक़ीन के नाम पर भी भ्रम है।
यह भ्रम भी एक और भ्रम है।
यह बगुलों का शहर है।




ज़रूर जान गयी कि
पत्थर कभी फूल से 
मुलायम नहीं होते  
इस धरती पर कभी
चमत्कार नहीं होते !




निष्कर्ष यही है कि कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आई है, तब-तब जनता ने उसे सबक सिखाया है, 

इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! पब्लिक सब बूझती है ! किसी नायक, नेता की नीयत और फितरत उससे छिपी नहीं रहती ! देर-सबेर वह सबक जरूर सिखाती है ! उसके लिए परिवार, जाति, भाषा, धर्म मायने जरूर रखते हैं, 
पर देश की सुरक्षा, देश की भलाई या देश की उन्नति की कीमत पर नहीं !    




इन वासंती हवाओं के टूटे पत्ते
बुलाते रास्ते पर आज भी मिल जायेंगे 
उसी ताजगी के एहसास को लिए भोर में 
अपनी महक को घोलते हुए कलियों के पहरुए
वे कपोलें नव पिछली बार देखे थे 





पौष-माघ की ठिठुरन में
है गरम रजाई माँ
तपती जेठ दुपहरी में
ठंडी अमराई माँ ।





कोई नहीं जानता 
कि कब तक उड़ेगी कौन सी पतंग ,
पर इतना तो तय है 
कि कितनी भी जीवटवाली हो पतंग,
कितना भी तेज़ हो उसका माँझा,





उसी रात उसे अपने बचपन की याद आ गई—दुकानों वाली गली, सुबह का कोहरा, और एक छोटा-सा चाय का ठेला चलाने वाला बुजुर्ग दंपती। लोग उन्हें “चाय वाली अम्मा” और “सुनार बाबा” कहते थे। वे खून के रिश्तों से नहीं, मगर मोहब्बत से सबके अपने बन गए थे। उनका कोई अपना नहीं आता था, फिर भी पूरा कस्बा उनका परिवार था। एक दिन चाय वाली अम्मा चली गई, और ठीक एक महीने बाद सुनार बाबा भी। तब कस्बे ने ही उनका अंतिम संस्कार किया, उनकी याद में रोया। उस छोटी लड़की ने पहली बार समझा था—खून का रिश्ता ही सब कुछ नहीं होता। सुबह होते ही वह युवती फिर उसी जगह गई, बूढ़े बाबा को खोजने



गरीब के हिस्से में आया तो
सिर्फ़ इंतज़ार, सिर्फ़ संघर्ष,
और फिर वही उम्मीद,
जो रोज़ शाम को थककर
उसकी पलकों पर सो जाती है।

जीवन के कितने ही बसंत
इंतज़ार में बीत गए,
पर उसके जीवन में
अब तक बसंत नहीं आया।


आज बस
सादर वंदन

काफी दिनों के बाद प्रस्तुति लगा रहा हूँ
कुछ भूला-भटका सा लग रहा है
हो सकता है कोई प्रस्तुति दुबारा लग गई हो
तो भी पढ़ लीजियेगा

अगर कसमें सच्ची होती हो 
तो तो सबसे पहले खुदा मरता


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

4631.... तुम्हारी सोच तय करती है...

 शुक्रवारीय अंक में 

आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
--------------
वन्दे सदा चेतसा ज्ञानशक्तिम्
हृदय से सर्वदा ज्ञानशक्ति प्रदात्री सरस्वती की वंदना करती हूँ।
ब्रह्मरूपिणी,सर्वव्यापिनी,चर-अचर मूढ़ जगत में 
बुद्धिरूपिणी देवी माँ सरस्वती को शत-शत नमन।

मानसिक प्रदूषण से रक्षा करने वाली देवी के आगमन से 
संपूर्ण प्रकृति उल्लासित और श्रृंगारित होने लगती है।
वृक्षों में नूतन किसलय,चित्ताकर्षक पुष्पों की सुवासित छटा,
आम्र मंजरियों से लदी अमराई में कोयल की कूक 
एवं भ्रमरों के गान, सरस रागिनी प्रकृति सौंदर्य 
को सुशोभित करते हैं, बसंती हवाओं की सुगंध कण-कण 
में बिखर जाती है। हर्षित धरा का गान हृदय में 
प्रेम और पवित्रता का संचार करते है। जग के झमेले 
से हटकर अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ समय निकालकर 
आप भी प्रकृति के उत्सव को महसूस कीजिए।

साहित्य के बसंत महाप्राण निराला जी की पुण्य स्मृति को सादर नमन।
 मुक्त छंद (स्वच्छंदता) के प्रवर्तक, व्यक्तिगत सुख-दुख की मार्मिक अभिव्यक्ति, प्रकृति चित्रण, क्रांति और विद्रोह की चेतना, सामाजिक यथार्थ का चित्रण (शोषितों के प्रति सहानुभूति), रहस्यानुभूति, आत्म-गौरव, ओज और औदार्य तथा भाषा की विविधता (सरल से संस्कृतनिष्ठ तक) सूर्य कांत त्रिपाठी निराला के लेखन की प्रमुख  विशेषताएं हैं, जो छायावाद से प्रगतिवाद तक के सफर को दर्शाती हैं।

----------
आज की रचनाऍं- 

प्रेम
किसी पुराने स्वेटर की तरह है
जो अब पहना नहीं जाता
पर फेंका भी नहीं जाता
ठंड अचानक बढ़ जाए
तो वही
सबसे पहले याद आता है




ज़रूरी है युद्ध
क्योंकि शांति के नाम पर
हर असहमत आवाज़ के सामने
हादसों के गड्ढे तैनात किये जा रहे हैं.
इसलिए
यह कोई नारा नहीं,
कोई उत्सव नहीं।

बस इतना जान लो
ज़रूरी है
यह युद्ध।




तुम ही तुम सजने लगे ख्यालों ख़्वाबों में ऐ सनम 
बदला चाल ढाल रंग ढंग खुद पर नाज़ हो गया है 
दिन हसीं रंगीन शामें लगने लगीं आजकल सनम 
उड़ने लगी मैं हवा में जबसे तूं सरताज हो गया है ।



याद रखना…
ज़िंदगी तुम्हें नहीं तोड़ती,
तुम्हारी सोच तय करती है
कि तुम टूटोगे या बनोगे।

Problem बड़ी नहीं होती,
हम उसे देखने का Angle छोटा कर देते हैं।

जब तुम कहते हो –
“मुझसे नहीं होगा”
तो ज़िंदगी भी कहती है –
“ठीक है, जैसा तुम चाहो।”


नीट की छात्रा......


-----------

आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
-------

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

4630..मौन का पड़ाव

 

गुरुवारिय प्रस्तुतिकरण के क्रम को बढाते हुए..

ज़रूरी है युद्ध—


ज़रूरी है युद्ध
किसी ज़मीन के लिए नहीं,
किसी झंडे के लिए नहीं,
ज़रूरी है युद्ध
उस थाली के ख़िलाफ़..

✨️

एहसास !

थप्पड खाकर वो 'डिस' उनकी

यूं, थोड़ी हमने भी चख दी थी,

✨️

मौन का पड़ाव



मौन का पड़ाव / अनीता सैनी
…….
उसकी
शिथिल पड़ती जुबान…

पर तुम उस एकांत को
छू नहीं सकते
जहाँ देह नहीं,
भाव

✨️

एक ताज़ा गीत -फूलों में इतवार

चित्र साभार गूगल






एक ताज़ा गीत -फूलों में इतवार 

गीत, पपीहा 

बांसुरी 

वासंती श्रृंगार.

प्रेमगीत 

लिखने लगा 

फूलों में इतवार.


पीली -नीली 

चिट्ठियां 

वन में पढ़े पलाश,

नदी किनारे 

खाट पर ..

✨️

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

बुधवार, 21 जनवरी 2026

4629..मैं सूर्य हूँ..

 ।।प्रातःवंदन।।

"मैं चलते-चलते  

इतना थक गया हूँ,  

चल नहीं सकता  

मगर मैं सूर्य हूँ,  

संध्या से पहले  

ढल नहीं सकता  " 

 कुँअर बेचैन

जीवन की गतिशीलता और इस पर विचार व्यक्त का इससे सुंदर भावपूर्ण रूप और क्या हो सकता, साथ ही प्रस्तुतिकरण पर नजर जरूर डाले..✍️

इश्क़ में तेरे फनकार बन करने लगी शायरी सनम

जो बिन बोले गुफ्त़गू कीं ऑंखों से ऑंखों ने सनम 

और तुम मुस्कुराये हर ज़ख्म का इलाज़ हो गया है ।


जब से तुझको नज़र भर कर देखी हैं ऑंखें सनम 

आशिकों की तरह आशिकाना मिज़ाज हो गया है  

इश्क़ में तेरे डूबी जिस्म से रूह में समा गये सनम 

दुनिया कहती है मेरा दीवानों सा अंदाज़ हो गया है ।

✨️

और पपीहा गाएगा

है अंधेरा तो उजाला भी 

यहां पर आयेगा

यह मयूरा वन के भीतर 

इस तरह हर्षायेगा 

जिंदगानी लेगी करवट ..

✨️

इसे वो पढ़ें जो हर वक्त कहते हैं क‍ि ''क्या करें...फुरसत ही नहीं म‍िल रही''....

पहले ऊपर का च‍ित्र देख‍िए फ‍िर पढ़‍िए आज की ये पोस्ट...ये उनके ल‍िए है जो हर..

✨️

घड़ी

  घड़ी सिर्फ़ समय नहीं बताती,

वह चेतावनी भी देती है।

आंखें दिखाती है,

बार-बार,

बिना चिल्लाए ।

मगर हम हैं कि..

✨️

फिल्म समीक्षाः मानवीय संबंधों पर बनी बेहतरीन फिल्म केडी

इन दिनों मुझे तमिल फिल्में देखने का चस्का लग गया है. बेशक, दक्षिण भारतीय फिल्मों में पर लाउड होने का आरोप लगता है और ज्यादातर मामलों में सही हो होता है. पर अब हिंदी फिल्में लाउड हो रही हैं और ज्यादातर हिंदी फिल्मों में कथानक गुम हो रहा है...

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह 'तृप्‍ति'..✍️

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

4628... इतिहास लिखे जो कायरता

मंगलवारीय अंक में
आप सभी स्नेहिल अभिवादन 
--------
जीवन का सही अर्थ समझने के क्रम में-

“जीवन का अर्थ खोजने के लिए नहीं, बल्कि उसे जीने के लिए है।” 

“जीवन का उद्देश्य खुश रहना है।” 

“हर पल का अर्थपूर्ण तरीके से जीना ही जीवन का अर्थ है।”

“दूसरों की सेवा करना ही जीवन का सच्चा अर्थ है।” –

“अपनी पूरी क्षमता तक जीना ही जीवन का अर्थ है।”


आपकी दृष्टिकोण से जीवन की परिभाषा क्या है?


आज की रचनाऍं- 


जो मस्तक झुकते आए हैं,

अब उन्हें जरा तन जाने दो,

जो न्याय की बाँसुरी टूट गई,

उसे फिर से स्वर बन जाने दो।

 

बाज़ार सजा है झूठों का,

तुम अपना सच ले अड़ जाओ,

इतिहास लिखे जो कायरता,

उस पन्ने को फट जाने दो।

 


मैं जल हूँ

घर से नदी-नालों तक

करता कल-कल हूँ

उत्तर से दक्षिण तक

चलता पल-पल हूँ

मुझमें कचरा न फैलाओ 

मुझे बचाओ

घने बादल न चुराओ 

मुझे बचाओ




तनहाई की याद सताए तनहाई में जाना हो 
तो फिर जंगल और पहाड़ी वीरानों से मिल लेना 

आंखें पुरनम हो जायें घनघोर उदासी छा जाये 
छत पे चहकती चिड़ियों की तुम मुस्कानों से मिल लेना 

तेज हवा से लड़ने का जब तुमको हुनर कुछ आ जाये 
तब तुम सागर की लहरों के तूफानों से मिल लेना 



तुम फूलों के 
रंग ,खुशबुओं में 
कवियों के स्वप्नलोक में ,
लोककथाओं 
जनश्रुतियों में 
प्रेमग्रंथ में कठिन श्लोक में ,
जलतरंग पर 
खिले कमल सी 
भ्रमरों का अनुनाद है |



अब वह सोच रहा था कि इस पत्र का क्या करे? पहले मन किया कि वह पत्र को फाड़ कर डस्टबिन के हवाले कर दे. फिर विचार आया ... नहीं, यह भागना होगा. जवाब लिखना चाहिए, और शगुन को सब कुछ समझा देना चाहिए. पर कैसे? उसे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह लिखे क्या? आखिर विचार आया अभी कुछ मत करो. वह उठा और उसने पत्र को सूटकेस में सबसे नीचे दबा कर रख दिया. जैसे किसी राज को दफ्न कर दिया हो. उसने महसूस किया उसका गला सूख रहा है. उसने अपनी बोतल उठाई और एक साँस में उसे मुहँ के जरीए अपने पेट में उड़ेल लिया



-----------
आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
-----------

सोमवार, 19 जनवरी 2026

4627...और हमें एहसास हुआ कि...

सोमवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
--------

“तुम जो भी हो, तुम जो भी करते हो, तुम अद्भुत और अद्वितीय हो. इस बात पर कभी शक मत करो।”


“यदि तुम्हें लगता है कि तुम यह कर सकते हो, तो तुम कर सकते हो. और यदि तुम्हें लगता है कि तुम यह नहीं कर सकते हो, तो तुम सही हो।”


“खुशी वह यात्रा है, मंजिल नहीं।”


“सफलता वह नहीं है जो आप हासिल करते हैं, बल्कि वह है जो आप बन जाते हैं जब आप उसे हासिल करते हैं।”


“सफलता अंतिम गंतव्य नहीं है, बल्कि यात्रा का आनंद लेने की प्रक्रिया है।"



 
 आज की रचनाऍं-

किसी ने खूब कहा
ये नजरअंदाजी,बेनियाजी 
उल्फ़त के ही अलग अंदाज है,
और हमे एहसास हुआ कि
फासले...बहुत नजदीक से ही
होकर तो गुजरती ..


लबों से कुछ कहो न कहोआँखें कह गईं
बिन छुए दिल को मिल जाए जो, वो दुआ हो क्या

नींदों के दरमियाँ तुम सपनों में आ गईं
बिखरी हुई सी ज़ुल्फ़ों की तुम अदा हो क्या

जिस दर्द से गुज़र गईंवो दर्द ही न रहा
पत्थर को भी पिघला दे, ऐसी रवा हो क्या



मौन बदलता है दृष्टिकोण।

देखने देता है दूसरा पक्ष ।

यज्ञ की समिधा है मौन ।

मौन गहरे पैठ पा जाता है मर्म।

मौन है गहरे कूप का जल ।

मन प्रांत कर देता शीतल ।

मौन का आकाश है स्वतंत्र।

मौन की व्याख्या है मौन ।





एक फूल से ही लगता जब
कितना सुन्दर आँगन ।
अनगिन फूल खिलें जिस आँगन
है कितना मन-भावन ।
किसने दीं हैं कुदरत को ये ,
खुशियाँ बिना हिसाब ।...




एक दिन पहुंच ही जाएंगे आकाशगंगा
के किनारे, यूँ तो आज नहीं ज़ेब
में एक भी ढेला, शून्य में थमा
हुआ सा लगे है सांसों का
हिंडोला । छोटी छोटी
खुशियों में रहते हैं
शामिल लंबे
उम्र के
राज़,



-----------
आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
-----------

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...