रो देते थे जिन बातो पर अब उदास नहीं होते
तालुख़ इस क़दर अपने तलख़ हुये,
दूर बहुत हो जाते है जब जरा पास नहीं होते.
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय सतीश सक्सेना जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए आज की चुनिंदा
रचनाएँ-
जब यह चुना गया
मेरे मन की बात पूरी हुई
सब जगह से प्रशस्ति पत्र मिले
मेरे मन को संतोष हुआ।
अगर बहता है बहने दो, तुम्हारी आँख का पानी-सतीश सक्सेना
जमा होने नहीं पाये , तुम्हारी आँख का पानी !
यही ठंडक बहुत देगा, तुम्हारी आँख का पानी!
हमेशा रोकने में ही , लगायी शक्ति जीवन में !
न जाने कितनी यादों को समेटे आँख का पानी!
हैं बहारें खिली मधुबन में, मौसम आज तड़पा रहा
गा रही हवाएं गीत मधुर, दिलअपना बस तुम्हारा रहा
बादल अँगना घिर घिर आया, छमाछम मींह बरसाया
निभाई प्रीत दिल से हमने ,हाल.अपना क्या कर लिया
खुशियाँ मिले तमाम उसको
घर परिवार मे भी खुशहाली हो
सपने उसके हो सब पूरे
वो परिवार की अंशुमाली हो ||
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
।।प्रातःवंदन। ।
मंगलवारीय अंक में
समंदर से सीखा है मैंने
जिसके पास
अश्क़ो का सैलाब होता है
वो रोया नहीं करते ।
सादर अभिवादन
सादर अभिवादन
सादर अभिवादन