सादर अभिवादन
कल वर्षगांठ सम्पन्न हुआ
चलिए कुछ तो हुआ
कभी-कभी तो कुछ
होता ही नहीं है पर
पर हुए जैसे दिखने
लगता है....
चलें रचनाओं की ओर
दुखी होता है जब जंगल निकल जाता है
डाल पर उल्लुओं को देख कर मुस्कुराता है ।
रोज का रोज मान लिया जलेबी बनाता है
पकौड़ी बन गई कभी किसी का क्या जाता है
कविता पढ़ने लग गए , भाग गए यमदूत ।
सुबह पाँच की ट्रेन से , आये कवि के पूत ।।
आये कवि के पूत , न थी जीवन की आशा ।
पहुँचे कमरे में तो देखा अजब तमाशा ।।
कविता पाठ कर रहे थे ,कविवर लक्कड़ जी ।
होकर बोर, मर गये थे बाबा फक्कड़ जी ।।
एक गुलाबी कमरा,
प्रतीक्षा के अंतिम छोर पर टिका,
लाल पर्दे के पीछे अपनी सिसक छुपाकर,
करता है स्वागत चमकीली धूप का,
खोलता है खिड़की के पल्ले,
ताज़ा हवा के झोंके से
करता है गुदगुदी अठखेलियाँ,
तुम्हें क्या समझाऊं?
एक उम्मीद थी... प्रेम,
एक मुलाकात की जरूरत थी,
आंखों में तुम्हारे एक समंदर था,
जो उम्र भर मेरा पीछा करती रही..
आज समझ में आया,
सब कुछ होते हुए भी क्या बेचैनी थी?
मोह के दल-दल में धँसते
मेरे चोटिल भाव
कंठ ने सिसकियाँ सोखी
उनकी बोलती आँखें
वे ब्रिज से सटे
जंगल की ओर संकेत करतीं
कैसे कहती उन्हें?
मेरे पाँव ने
स्वार्थ की चप्पल पहनी हैं
जिससे तुम अनभिज्ञ हो।
साँझी लेखनी साँसे कोई प्रत्युत्तर
अंकित इस राज की l
बहक उलझ गयी थी केशें
उस हसीं चित्रण ख्वाब की ll
अंतरंगी डोर वैतरणी रूपरेखा
उस खोई पहेली शाम की l
सतरंगी साजों धुन पिरो रही
छलकती ओस बूँदों ख़ास की ll
अरे भाई सुनो !
होश में तो हो !
तुम बस में
धक्का-मुक्की
कर के चढ़े
मवाली नहीं हो !
जो औरतों पर
अपना वज़न
डालते हुए,
टटोलते हुए,
आगे बढ़ते हैं ।
बस
कल सखी मिलेगी
सादर वंदन











