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रविवार, 18 मार्च 2018

975.....हिन्दू नववर्ष का प्रथम दिवस

सादर अभिवादन..
आज वर्ष प्रतिपदा है


हिन्दू नववर्ष का प्रथम दिवस
आहा..नया साल आ गया

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा 'वर्ष प्रतिपदा' कहलाती है। 
इस दिन से ही नया वर्ष प्रारंभ होता है। 
कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधर्व, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, 
पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुंरू होता है। अत इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं। चैत्र ही एक ऐसा महीना है, जिसमें वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती हैं। 
शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस माना जाता है। जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही प्रदान करता है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है। 
इसीलिए इस दिन को वर्षारंभ माना जाता है।

मातारानी को नमन करते हुए
आइए देखें पिछले वर्ष में लिखी रचनाएँ....

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बूढ़े पीपल की 
नवपत्रों से ढकी 
इतराती शाखों पर
कूकती कोयल की तान
हृदय केे सोये दर्द को जगा गयी
हवाओं की हँसी से बिखरे 
बेरंग पलाश के मुरझाये फूल,

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न ही हृदय में आह के स्वर,
न ही भाव में पलते प्रवाह के ज्वर,
निस्तेज पड़ी मुख की आभा,
बुझी सी है वो तेज प्रखर.....

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दीप जैसे जले रोशनी के लिए
भाव जैसे मुखर जिंदगी के लिए

पी के स्वयं मैं अंधकार तुझे हमसफ़र
दे रही हूं दुआ उजाले के लिए

फिर मुद्दतों बाद जी चाहता है कि पढ़ें 
तुम्हारा वही आधा - अधूरा ख़त, 
कुछ  लजाए - सकुचाए से 
अल्फ़ाज़, कुछ  नाज़ -
अंदाज़ लिए भीगे 
हुए जज़्बात -
अलमस्त। 

My photo
कभी फ़िकर नहीं करती 
कि कैसी दिखती हूँ मैं
मुझे परवाह है तो इतनी 
कि तुम कैसे देखते हो मुझे
मैं 
रंग और नूर की 
बारात का हिस्सा तो नहीं हूँ 

आगे भी बढ़ूँगी...थमी नहीं हूँ अभी


पहला प्यार...मनोज नौटियाल
विद्यालय से लेकर घर तक ,और घर से विद्यालय आना 
तुम्हे देखने की चाहत का , वही ठौर था वही ठिकाना
मेरे बाल सखाओं की तुम, सबसे पहली भाभी जी थी 
सुलझ नहीं पाया है अब तक , रिश्तों का वो ताना बाना ।।


समझदार हो चला.....अनामिका घटक
कभी समंदर तो कभी दरिया बन के
कभी आग तो कभी शोला बन के

ज़रूरतमंदों ने खूब गले लगाया था मुझे
काम आया हूँ मैं जाने कैसे कैसे उनके
..................
आज काफी बतकही हो गई
इस प्रस्तुति को लेकर
हम लगाएँगे -
हम लगाएँगे  की
रट लगी....आखिर में
विजय श्री उन्हें ही मिली
वे थक-हारकर हमें इज़ाज़त दे दी

यशोदा
सादर..








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