निवेदन।


फ़ॉलोअर

966 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
966 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

966.....हंसती-मुस्कुराती है, खुशियाँ लुटाती है, बोलती-बतियाती है,

सादर नमस्कार 
नारी दिवस पर उठा अधिकार, समानता और स्वतंत्रता का शोर, मुबारकबाद की जगमगाहट ने आधी आबादी को चकाचौंध से भर 
दिया है। सोशल मीडिया से जुड़ी पढ़ी-लिखी,पुरुषों के बराबरी करती हुई महिलाओं को बहुत 
अच्छा लग रहा होगा, ख़ुद को महत्वपूर्ण महसूस करने का एहसास सुखद तो होता ही है। पर अपने आस-पास नज़र डालने पर सोचने 
लगी पड़ोस की रमा ताई, मेरी घरेलू सहायक, कपड़े धोने वाली 
या सामने की बन रही बिल्डिंग में महिला मजदूर बन काम करने वाली 
जैसी बस्ती की अनगिनत औरतों को तो पता भी नहीं उनके 
नाम पर कैसा त्योहार मनाया जा रहा है। अपने दैनिक जीवन 
खोल में सिमटी औरतों तक भी बदलाव की हवा का शीतल झोंका पहुँचेगा कालान्तर में ऐसी उम्मीद हम कर सकते है।
◆◆◆◆◆◆◆◆●●●●●●◆◆◆◆◆◆◆

चलिए आपके रचनात्मकता के संसार में आपके द्वारा 
सुरभित पराग का आनंद लेते है.....
आदरणीया मीना जी की रचना
तिलमिलाता क्यों, ना जाने
शक्ति का पूजक समाज,
माँगती है अपने जब,
अधिकार औरत !!!
◆◆◆◆◆◆◆◆●●●●●●◆◆◆◆◆◆◆

आदरणीया जेन्नी शबनम जी की कलम से निसृत
मैं ठिठक कर तब से खड़ी  
काल चक्र को बदलते देख रही हूँ,  
कोई जिरह करना नहीं चाहती  
न कोई बात कहना चाहती हूँ  
◆◆◆◆◆◆◆●●●●●◆◆◆◆◆◆◆◆

आदरणीया यशोदा दी की लेखनी से प्रसवित
आपसे एक विनती है कि हमें ये शक्ति भी प्रदान करे कि हम महिलाएँ एक - दूसरे की ताकत बनें कमजोरी नहीं, हम एक-दूसरे का दर्द समझे और उससे उबरने कोशिश भी मिलकर करे, महिलाओं को लिए महिलाओं की ये कोशिश बहुत जरूरी है। 
◆◆◆◆◆◆◆●●●●●●◆◆◆◆◆◆◆

आदरणीय अरुण साथी की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति
जैसे ही कोई बेटी
अपने सपनों को
पंख लगाती है,
वह चरित्रहीन हो जाती है....!
◆◆◆◆◆◆◆●●●●●◆◆◆◆◆

आदरणीय रेवा जी की रचना
जब रिश्तों की प्यास
से गला सूखा और प्यार
ढूंढा तब सिर्फ और
सिर्फ भ्रम हाथ लगा ....
और तब काम आया खुद की
जेब में भरा दोस्तों का प्यार ...
◆◆◆◆◆◆◆●●●●●●◆◆◆◆◆◆◆

आदरणीय दिलबाग सिंह 'विर्क' जी की लेखनी से
सफ़र ज़िंदगी का कब कटता है सिर्फ़ यादों के सहारे 
ज़िंदा रहना चाहता हूँ मैं, करने दे कोई काम मुझे ।

इश्क़ करना, लुटना, फिर रोना, ये कोई हुनर तो नहीं
क्या था मैं, क्यों सिर-आँखों पर बैठाता अवाम मुझे । 
◆◆◆◆◆◆◆◆●●●●●●◆◆◆◆◆◆◆◆

आदरणीया मीना भारद्वाज जी की कलम से प्रस्फुटित
मेरी फ़ोटो
यूं तो तुमसे
कोई गिला नही
बिना बताये
खामोशियों के पुल
दूरी बढ़ा‎ देते हैं
◆◆◆◆◆◆◆◆●●●●●◆◆◆◆◆◆◆◆
आदरणीय ज्योति खरे जी की कलम
सही कहती है.......
मेरी फ़ोटो चाहती हैँ ईँट भट्टोँ मेँ काम करने वाली महिलाएं कि उनका भी अपना घर हो
◆◆◆◆◆◆◆◆●●●●●◆◆◆◆◆◆◆◆
हम-क़दम का नौवें  क़दम
का विषय...

...........यहाँ देखिए...........
◆◆◆◆◆◆◆◆●●●●●◆◆◆◆◆◆◆◆
आज की कहानी यहीँ तक कल मिलिएगा विभा दीदी से श्वेता
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...