सोलह फरवरी को
अपने जीवन के दूसरे वर्ष मे कदम रखा है
अशेष शुभकामनाएँ श्वेता जी को
सादर अभिवादन स्वीकारें....
आज प्रस्तुत है
आज प्रस्तुत है
मन के पंखों की परवाज़
श्वेता जी के शब्दों में
सालभर बीत गये कैसे...पता ही नहीं चला।
हाँ, आज ही के दिन १६ फरवरी २०१७ को पहली बार ब्लॉग पर
लिखना शुरु किये थे। कुछ पता नहीं था ब्लॉग के बारे में।
आदरणीय पुरुषोत्तम जी की रचनाएँ पढ़ते हुये समझ आया
कि साहित्य जगत के असली मोती तो ब्लॉग जगत में
महासागर में छुपे हैं। हिम्मत जुटाकर फिर अपने
मोबाईल-फोन के माध्यम से ही एक एकाउंट बना लिये हम भी
" मन के पाखी "
चलिए समय ज़ाया न करते हुए
ज़ायजा लेते है..
ज़ायजा लेते है..
" मन के पाखी "
ऐ दिल,चल तू संग मेरे
मेरे ख्यालों के हसीन
दुनिया में...
जहाँ हूँ मैं और तुम हो
उस हसीन दुनिया मे
" मन के पाखी "

घोलकर तेरे एहसास जेहन की वादियों में,
मुस्कुराती हूँ तेरे नाम के गुलाब खिलने पर।
तेरा ख्याल धड़कनों की ताल पर गूँजता है,
गुनगुनाते हो साँसों में जीवन रागिनी बनकर।
" मन के पाखी "
गुनगुना रही है हवा तुम्हारी तरह
मुस्कुरा रहे है गुलाब तुम्हारी तरह
ढल रही शाम छू रही हवाएँ तन
जगा रही है तमन्ना तुम्हारी तरह
" मन के पाखी "

जिंदगी तेरे राह में हर रंग का नज़ारा मिला
कभी खुशी तो कभी गम बहुत सारा मिला
जो गुजरा लम्हा खुशी की पनाह से होकर
बहुत ढ़ूँढ़ा वो पल फिर न कभी दोबारा मिला
तय करना है मंजिल सफर में चलते रहना है
वो खुशनसीब रहे जिन्हें हमसफर प्यारा मिला
" मन के पाखी "

जीवन सिंधु की स्वाति बूँद
तुम चिरजीवी मैं क्षणभंगुर,
इस देह से परे मन बंधन में
मादक कुसुमित तेरा साथ प्रिय।
" मन के पाखी "

हाँ,मैं ख़्वाब लिखती हूँ
अंतर्मन के परतों में दबे
भावों की तुलिका के
नोकों से रंग बिखेरकर
शब्द देकर
मन के छिपे उद्गगार को
मैं स्वप्नों के महीन जाल
लिखती हूँ।
" मन के पाखी "

न ही तम में न मैं घन में
न मिलूँ मौसम के रंग में
पाषाण मोम बन के बहे
वो मीत कोमल मन हूँ मैं
उपरोक्त सात रचनाओं में
साल समेटने की कोशिश की है मैनें
दिन पर दिन निखरती कलम..
साल समेटने की कोशिश की है मैनें
दिन पर दिन निखरती कलम..
वो कलम जो मन से लिखे
वो कलम हमारे पास नही है
वो कलम हमारे पास नही है
उन्हीं की कलम से समापन भी
"जो छू ना पाये हिय तेरा
वो गीत बनकर क्या करूँ"
...........
अथ प्रारम्भ....
दिग्विजय
दिग्विजय